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Dhurandhar Film Review: धुरंधर फिल्म समीक्षा, कराची के ल्यारी गिरोहों की अंधेरी दुनिया, सत्ता, खून और साज़िशों का लंबा सफ़र

Dhurandhar Film Review: धुरंधर फिल्म समीक्षा, कराची के ल्यारी गिरोहों की अंधेरी दुनिया, सत्ता, खून और साज़िशों का लंबा सफ़र

आदित्य धर की नई फिल्म ‘धुरंधर’ एक भारी-भरकम सिनेमाई अनुभव है, जिसमें 3 घंटे 34 मिनट की लंबाई के बावजूद घटनाओं और भावनाओं का दबाव कभी कम नहीं होता। यह फिल्म कराची के बदनाम ल्यारी इलाके की हिंसक गलियों, भारत–पाकिस्तान के जटिल राजनीतिक रिश्तों, आतंकी नेटवर्क और उच्चस्तरीय खुफिया जंग को एक साथ मिलाकर रची गई कहानी है। फिल्म खत्म होते-होते यह एक लंबे विराम पर थमती है — ‘आगे जारी रहेगा’, जो स्पष्ट संकेत देता है कि यह केवल शुरुआत है।

फिल्म की कहानी पाकिस्तान के आतंकी तंत्र में भारत की खुफिया घुसपैठ और उसके दौरान होने वाली हिंसा व राजनीतिक दांव–पेच को केंद्र में रखती है। कहानी वास्तविक घटनाओं जैसे कंधार विमान अपहरण, 2001 संसद हमला, 26/11 मुंबई हमलों से प्रेरित है, जिनके माध्यम से निर्देशक भारत पर हुए आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि और उनकी रणनीतिक परिणतियों को दर्शाते हैं।

फिल्म का मुख्य पात्र इंटेलिजेंस ब्यूरो प्रमुख सान्याल, जिसे आर. माधवन ने निभाया है, भारतीय खुफिया एजेंसियों में मौजूद प्रणालीगत विफलताओं और राजनीतिक हस्तक्षेप पर कड़े सवाल उठाता है। उसके संवादों में व्यवस्था की निराशा और राष्ट्रवाद के उग्र स्वर दोनों मौजूद हैं — जैसे कि “भारतीय, भारतीयों के सबसे बड़े दुश्मन हैं”, “हमें ऐसी सरकार का इंतजार करना होगा जो हमारी तरह सोचती हो”, और “भारत माता की जय” जैसे नारे, जो लंबी बहस छेड़ सकते हैं।

कहानी का बड़ा हिस्सा रणवीर सिंह द्वारा निभाए गए अंडरकवर एजेंट हमज़ा के इर्द-गिर्द घूमता है। वह एक बलूच के भेष में कराची के सबसे खतरनाक इलाके ल्यारी में गहरे जाल में फंसता जाता है। मुश्किल परिस्थितियों में रहकर उसे गैंग लीडर रहमान बलूच (विक्की खन्ना) का विश्वास जीतना होता है, ताकि भारत उस आतंकी नेटवर्क तक पहुंच सके जिसे पाकिस्तान की सत्ता संरचनाओं का संरक्षण प्राप्त है।

खन्ना इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी साबित होते हैं। वह एक ऐसे गैंगस्टर का इंसानी रूप दिखाते हैं जो परिवार और सत्ता के बीच पिसते-पिसते बिखर जाता है। पंडोर उसके वफादार साथी उज़ैर की भूमिका में गहराई से प्रभावित करते हैं, जबकि आशुतोष बेदी एक भ्रष्ट राजनेता जमील के तौर पर सटीक और यादगार प्रदर्शन देते हैं। उनके चेहरे पर छल, समझौते और राजनीतिक भूख का संयोजन फिल्म की असली परतें खोलता है।

फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी बनती है अर्जुन की भूमिका, जो जमील की बेटी के रूप में दिखाई देती है। एक महत्वाकांक्षी डॉक्टर होने के बावजूद वह बिना किसी मजबूत कारण के हमज़ा के प्रेम में खुद को मिटा देती है, और उसकी उपस्थिति मुख्य कहानी के भार से हटी हुई लगती है।

फिल्म में हिंसा, खून-खराबा और अराजकता बेहद आक्रामक रूप में दिखाई गई है, और कई जगह यह सवाल उठाता है कि क्या इतनी क्रूरता कहानी कहने की आवश्यकता थी या दर्शकों को झकझोरने की कोशिश भर। हालांकि, कराची का राजनीतिक–सामाजिक परिवेश, बेनजीर भुट्टो के संदर्भ, सत्ता–माफिया गठजोड़ और वास्तविक ऑडियो रिकॉर्डिंग्स का उपयोग फिल्म को वास्तविकता का एक कठोर चेहरा देता है।

रणवीर सिंह, रामपाल (आईएसआई मेजर इकबाल) और संजय दत्त (एनकाउंटर स्पेशलिस्ट चौधरी असलम) का संघर्ष और शक्ति प्रदर्शन फिल्म का एक बड़ा आकर्षण है — एक तरह का पुरुष शक्ति–प्रतिष्ठा मुकाबला, कि कौन कितना दर्द सह सकता है और दे सकता है।

धुरंधर भावनात्मक रूप से भी भारी है और वैचारिक रूप से भी। यह फिल्म राष्ट्रीयता, प्रतिरोध, बदला और राजनीतिक मोर्चेबंदी के बीच खड़े एक आम दर्शक से पूछती है — सही कौन है और गलत कौन?

अंततः, आदित्य धर की यह फिल्म सिनेमाई गुणवत्ता, राजनीतिक साहस और तकनीकी प्रस्तुति के मामले में महत्वाकांक्षी है। लेकिन इसकी लंबाई, अतिशय हिंसा और उग्र राष्ट्रवादी टोन इसे विवादित भी बनाते हैं। फिल्म वहीं खत्म होती है जहां इसकी असली लड़ाई शुरू होती है — और अगला भाग बहुत कुछ समझाने का वादा करता है।

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