Delhi Air Pollution: दिल्ली की जहरीली हवा गर्भ में पल रहे बच्चों के लिए बन रही खतरा, एम्स के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा

Delhi Air Pollution: दिल्ली की जहरीली हवा गर्भ में पल रहे बच्चों के लिए बन रही खतरा, एम्स के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा
नई दिल्ली, 3 जून। राजधानी दिल्ली की प्रदूषित हवा अब केवल फेफड़ों, हृदय और श्वसन तंत्र तक ही सीमित खतरा नहीं रह गई है, बल्कि यह गर्भ में पल रहे शिशुओं के स्वास्थ्य और विकास पर भी गंभीर प्रभाव डाल रही है। एम्स सहित देश के कई प्रमुख शोध संस्थानों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण के अत्यंत सूक्ष्म कण गर्भनाल (प्लेसेंटा) तक पहुंचकर ऐसी जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं, जो भ्रूण के सामान्य विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल ईएमबीओ मॉलिक्यूलर मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, पीएम2.5 और पीएम10 जैसे सूक्ष्म प्रदूषण कण प्लेसेंटा की सुरक्षा परत को पार कर वहां ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा करते हैं। इससे प्लेसेंटा की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और भ्रूण तक आवश्यक पोषक तत्वों तथा ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो सकती है। परिणामस्वरूप गर्भस्थ शिशु के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि वायु प्रदूषण भ्रूण की वृद्धि और विकास के लिए महत्वपूर्ण आईजीएफबीपी3 (IGFBP3) जीन की सक्रियता को कम कर देता है। यह जीन इंसुलिन-लाइक ग्रोथ फैक्टर प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भ्रूण की वृद्धि, ऊतकों के विकास और अंगों के निर्माण को नियंत्रित करता है। जब प्रदूषण के कारण इस जीन की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तो भ्रूण के विकास में रुकावट, कम जन्म वजन और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। प्रमुख शोधकर्ता और एम्स दिल्ली के बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुभ्रदीप करमाकर ने बताया कि अध्ययन में दिल्ली और झारखंड के देवघर क्षेत्र के लगभग 994 प्रसव रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। शोध के परिणामों से पता चला कि जिन क्षेत्रों में पीएम2.5 का स्तर अधिक था, वहां कम वजन वाले बच्चों के जन्म का जोखिम लगभग दोगुना पाया गया। वहीं प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर गर्भावस्था जटिलता का खतरा लगभग तीन गुना अधिक देखा गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रदूषण से उत्पन्न इंटरल्यूकिन-1 बीटा जैसे सूजनकारी अणु आईजीएफबीपी3 जीन की सक्रियता को दबा देते हैं। इसके कारण प्लेसेंटा में रक्त वाहिकाओं का निर्माण, कोशिकाओं की वृद्धि और पोषक तत्वों की आपूर्ति प्रभावित होती है, जो भ्रूण के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण के संपर्क में आने वाले बच्चों में जन्म के बाद कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इनमें मोटर समन्वय की कमजोरी, व्यवहार संबंधी बदलाव, सूजन से जुड़े जैविक संकेतकों में वृद्धि तथा न्यूरोलॉजिकल विकास पर प्रतिकूल प्रभाव शामिल हैं। इसके अतिरिक्त शोधकर्ताओं को शरीर में सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक जैसी जहरीली धातुओं के पहुंचने के भी प्रमाण मिले हैं, जो लंबे समय तक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन केवल पर्यावरणीय प्रदूषण से जुड़ा शोध नहीं है, बल्कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि गर्भवती महिलाओं को वायु प्रदूषण से बचाने के लिए विशेष सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों और प्रभावी उपायों की आवश्यकता है, क्योंकि प्रदूषण का असर जन्म से पहले ही अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य और विकास को प्रभावित कर सकता है। शोध से स्पष्ट संकेत मिलता है कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा भी है। इसलिए गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण को नीति निर्माण की प्राथमिकताओं में शामिल करना समय की आवश्यकता बन गया है।





