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PCOS Study: नियमित योगाभ्यास से पीसीओएस के लक्षण घटे, गर्भधारण की संभावना बढ़ी : अध्ययन

PCOS Study: नियमित योगाभ्यास से पीसीओएस के लक्षण घटे, गर्भधारण की संभावना बढ़ी : अध्ययन

नई दिल्ली। आधुनिक जीवनशैली और बदलती खानपान की आदतों के कारण महिलाओं में तेजी से बढ़ रही पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) की समस्या को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन सामने आया है। शोध के अनुसार नियमित योगाभ्यास न केवल पीसीओएस के लक्षणों को कम करने में सहायक है, बल्कि इससे महिलाओं की प्रजनन क्षमता में भी सुधार होता है और गर्भधारण की संभावना बढ़ सकती है। यह अध्ययन एम्स दिल्ली के लैब फॉर मॉलिक्यूलर रिप्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स विभाग की प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा के नेतृत्व में किया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार पीसीओएस वर्तमान समय में महिलाओं में होने वाली सबसे सामान्य हार्मोनल समस्याओं में से एक है। भारत में लगभग 5 से 20 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी स्तर पर इस बीमारी से प्रभावित हैं। यह समस्या केवल हार्मोनल असंतुलन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब इसे एक मेटाबोलिक विकार के रूप में भी देखा जा रहा है। पीसीओएस के कारण अनियमित मासिक धर्म, मोटापा, चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल, मुहांसे, हार्मोनल असंतुलन और गर्भधारण में कठिनाई जैसी समस्याएं सामने आती हैं।

डॉ. रीमा दादा ने बताया कि कई महिलाओं को पीसीओएस का पता तब चलता है जब उन्हें विवाह के बाद गर्भधारण में परेशानी होती है। जबकि यदि शुरुआती अवस्था में इसकी पहचान हो जाए तो इसका प्रबंधन और उपचार अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा उपचार के साथ जीवनशैली में सुधार और योग को शामिल करने से बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

अध्ययन में पाया गया कि पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को जब नियमित योगाभ्यास कराया गया तो उनके स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। योगाभ्यास से तनाव कम हुआ, हार्मोनल संतुलन बेहतर हुआ और शरीर की चयापचय प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आए। इसके परिणामस्वरूप वजन नियंत्रण, मुहांसों में कमी, नियमित मासिक धर्म और प्रजनन क्षमता में सुधार दर्ज किया गया।

शोध की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि अध्ययन में शामिल कई महिलाएं गर्भधारण करने में सफल रहीं। शोधकर्ताओं का मानना है कि योग के माध्यम से शरीर और मन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार होता है और गर्भधारण की संभावना बढ़ सकती है। अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों को 12 सप्ताह तक नियमित योग कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। महिलाओं ने सप्ताह में पांच दिन प्रतिदिन लगभग 90 मिनट योगाभ्यास किया। इस कार्यक्रम में सूर्य नमस्कार, बद्धकोणासन, सुप्त बद्धकोणासन, विपरीतकरणी आसन, भुजंगासन, भ्रामरी प्राणायाम, अनुलोम-विलोम प्राणायाम और ध्यान को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन योगासनों और प्राणायाम तकनीकों के नियमित अभ्यास से हार्मोन स्तर में संतुलन आया, तनाव और चिंता कम हुई, शरीर का वजन नियंत्रित हुआ और मासिक धर्म चक्र अधिक नियमित हुआ। इसके साथ ही महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य में भी सकारात्मक बदलाव दर्ज किए गए।

विशेषज्ञों का कहना है कि योग शरीर के हार्मोनल तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर प्रभाव डालता है। यही कारण है कि पीसीओएस जैसी जटिल समस्या के प्रबंधन में यह एक प्रभावी सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में उभर रहा है। हालांकि डॉक्टरों का सुझाव है कि पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को केवल योग पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह के अनुसार उपचार, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम को भी अपनाना चाहिए।

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा उपचार के साथ नियमित योगाभ्यास को जोड़कर पीसीओएस के प्रभावी प्रबंधन की दिशा में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ मातृत्व की संभावना भी बढ़ सकती है।

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