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Noida sector 150: हेड रेगुलेटर बनता तो नहीं डूबता सेक्टर-150, 2015 से कागज़ों में अटकी योजना ने ली इंजीनियर की जान

Noida sector 150: हेड रेगुलेटर बनता तो नहीं डूबता सेक्टर-150, 2015 से कागज़ों में अटकी योजना ने ली इंजीनियर की जान

नोएडा के सेक्टर-150 में जलभराव वाले गहरे गड्ढे में डूबकर 27 वर्षीय इंजीनियर की मौत के बाद सरकारी सिस्टम की गंभीर लापरवाही सामने आई है। जांच में सामने आया है कि इलाके में बारिश के पानी की निकासी के लिए प्रस्तावित स्टॉर्मवॉटर मैनेजमेंट योजना पिछले लगभग एक दशक से केवल फाइलों तक ही सीमित रही। यदि यह योजना समय पर लागू हो जाती, तो न सिर्फ जलभराव की समस्या से राहत मिलती, बल्कि एक युवा इंजीनियर की जान भी बच सकती थी।

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने वर्ष 2015 में ही सेक्टर-150 और आसपास के विकसित हो रहे क्षेत्रों से वर्षा जल को हिंडन नदी में मोड़ने के लिए एक हेड रेगुलेटर के निर्माण का प्रस्ताव रखा था। इस योजना का उद्देश्य बारिश के दौरान पानी को नियंत्रित तरीके से नदी में छोड़ा जाना था, ताकि प्लॉट, सड़कें और आवासीय परियोजनाएं जलभराव से सुरक्षित रह सकें।

9 अक्टूबर 2023 को सिंचाई निर्माण खंड, गाजियाबाद के कार्यकारी अभियंता द्वारा नोएडा प्राधिकरण के वर्क सर्किल-10 के वरिष्ठ प्रबंधक को भेजे गए पत्र में इस परियोजना के वर्षों से लंबित रहने का विस्तृत उल्लेख किया गया है। पत्र में बताया गया है कि 2015 से 2023 के बीच कई बार पत्राचार हुआ, बैठकें हुईं और निरीक्षण किए गए, लेकिन इसके बावजूद योजना को धरातल पर उतारा नहीं जा सका।

रिकॉर्ड के अनुसार 4 अक्टूबर 2023 को सेक्टर-150 में प्रस्तावित हेड रेगुलेटर स्थल पर संयुक्त निरीक्षण किया गया था। इस निरीक्षण में नोएडा प्राधिकरण के डिप्टी जनरल मैनेजर (सिविल एवं जल), वरिष्ठ और सहायक प्रबंधक तथा सिंचाई विभाग के अभियंता शामिल थे। इससे पहले फरवरी 2016 में नोएडा प्राधिकरण ने सर्वे, डिज़ाइन और ड्रॉइंग के लिए सिंचाई विभाग को 13.5 लाख रुपये जारी किए थे। प्राधिकरण द्वारा दिए गए आंकड़ों के आधार पर एक कंसल्टेंट से डिज़ाइन तैयार कराए गए थे, जिन्हें आईआईटी दिल्ली से भी अनुमोदन मिल चुका था।

शुरुआत में इस परियोजना में मैकेनिकल गेट वाले हेड रेगुलेटर का प्रस्ताव था। हालांकि अक्टूबर 2023 के संयुक्त निरीक्षण के दौरान नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों ने यह जानकारी दी कि अन्य सेक्टरों का स्टॉर्मवॉटर भी इसी नाले से जुड़ चुका है, जिससे पानी का डिस्चार्ज पहले से कहीं अधिक बढ़ सकता है। इसी कारण मैकेनिकल गेट की जगह हाइड्रोलिक या न्यूमैटिक गेट लगाने का सुझाव दिया गया। इसके बाद सिंचाई विभाग ने डिज़ाइन में बदलाव की आवश्यकता बताते हुए नए सर्वे, संशोधित ड्रॉइंग और अपडेटेड हाइड्रोलॉजिकल डेटा के लिए 30 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग रख दी।

इस पूरी देरी का खामियाजा 2023 के मानसून में सेक्टर-150 और आसपास के इलाकों को भुगतना पड़ा। भारी बारिश के दौरान कई प्लॉट और गहरे गड्ढे पानी से भर गए, जबकि कई हाउसिंग सोसायटियों के बेसमेंट पूरी तरह जलमग्न हो गए। स्थानीय निवासियों का कहना है कि हेड रेगुलेटर न होने के कारण बारिश का पानी समय पर हिंडन नदी में नहीं छोड़ा जा सका। नदी का जलस्तर बढ़ने पर बैकफ्लो का खतरा भी बना रहा, जिससे हालात और बिगड़ गए।

ATS, ACE, गोदरेज, टाटा, एल्डेको और समृद्धि जैसे बड़े डेवलपर्स की आवासीय परियोजनाएं भी इस जलभराव से प्रभावित हुईं। अब इंजीनियर की मौत के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि जब योजना वर्षों पहले तैयार थी, सर्वे और डिज़ाइन स्वीकृत थे, तो आखिर इसे लागू करने में इतनी देरी क्यों हुई। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि शहरी जल निकासी व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

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