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Mayurbhanj Tribal India: प्रतीकों से आगे कैसे मयूरभंज दिखाता है जनजातीय भारत के प्रति नए दृष्टिकोण को

Mayurbhanj Tribal India: प्रतीकों से आगे कैसे मयूरभंज दिखाता है जनजातीय भारत के प्रति नए दृष्टिकोण को

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रिपोर्ट: अभिषेक ब्याहुत

राष्ट्र केवल सड़कों, इमारतों और बुनियादी ढांचे से नहीं बनते। राष्ट्र की पहचान उन इतिहासों से भी बनती है जिन्हें वह सम्मान देता है, उन समुदायों को पहचान देता है जिन्हें वह अपने साथ जोड़ता है और उन परंपराओं को महत्व देता है जिन्हें वह अपनी राष्ट्रीय कहानी का हिस्सा बनाता है।

स्वतंत्र भारत के लंबे इतिहास में जनजातीय समुदायों को लेकर चर्चा अक्सर अभाव के नजरिये से होती रही है। आदिवासी क्षेत्रों को गरीबी, पिछड़ापन, विस्थापन, सामाजिक उपेक्षा और उग्रवाद जैसी चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाता रहा। ये समस्याएं वास्तविक थीं और इनके समाधान के लिए निरंतर नीतिगत प्रयास जरूरी थे, लेकिन इस दृष्टिकोण में एक दूसरी महत्वपूर्ण सच्चाई अक्सर पीछे छूट गई।

वास्तविकता यह है कि भारत के जनजातीय समुदाय देश की सबसे प्राचीन जीवित सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षक हैं। वे प्रकृति के साथ संतुलन बनाने वाली जीवन शैली, पर्यावरण संरक्षण की समझ और ऐसी सांस्कृतिक विरासत के वाहक हैं, जिसने सदियों से भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया है।

पिछले एक दशक में जनजातीय समुदायों के प्रति सरकार के दृष्टिकोण में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई दिया है। विकास अब भी केंद्र में है, लेकिन इसके साथ सम्मान, प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक पहचान को भी महत्व दिया जा रहा है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मयूरभंज यात्रा इसी बदलते दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस यात्रा का महत्व केवल शुरू की गई योजनाओं या सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं था। इसका बड़ा संदेश यह था कि जनजातीय समुदाय केवल विकास योजनाओं के लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि वे भारत की सभ्यतागत पहचान के महत्वपूर्ण भागीदार भी हैं।

मयूरभंज ने इस बदलाव की शुरुआत नहीं की, बल्कि उसने इस बदलाव को सामने लाने का काम किया।

कल्याण से आगे बढ़ता जनजातीय विकास मॉडल

लंबे समय तक भारत में जनजातीय नीतियों का मुख्य उद्देश्य विकास की कमी को दूर करना रहा। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार, आर्थिक अवसर और मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच कई जनजातीय क्षेत्रों में सीमित रही। इन कमियों को दूर करने के लिए सरकारों ने योजनाएं बनाई और यह आवश्यक भी था।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सोच का दायरा और व्यापक हुआ है। अब उद्देश्य केवल सहायता पहुंचाना नहीं, बल्कि जनजातीय समुदायों को विकास यात्रा में सक्रिय भागीदार बनाना है, साथ ही उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना भी है।

यह दृष्टिकोण कई योजनाओं में दिखाई देता है। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए पीएम जनमन योजना का उद्देश्य उन समुदायों तक विकास पहुंचाना है जो लंबे समय से सबसे अधिक वंचित रहे हैं। एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का विस्तार जनजातीय युवाओं को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इसके अलावा सड़क, रेल, स्वास्थ्य सुविधाओं, डिजिटल कनेक्टिविटी और सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों की पुरानी विकास संबंधी कमियों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

रोजगार और आजीविका के क्षेत्र में भी बदलाव देखने को मिला है। लघु वन उपज के बेहतर मूल्य, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा और जनजातीय उद्यमिता को प्रोत्साहन इस बात को दर्शाता है कि आर्थिक सशक्तिकरण स्थानीय कौशल और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर होना चाहिए।

यह बदलाव सहायता से सशक्तिकरण और कल्याण से भागीदारी की ओर बढ़ते दृष्टिकोण को दर्शाता है।

 

इसी सोच ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में भी नई दिशा दी है। अनुभव बताता है कि केवल सुरक्षा उपायों से स्थायी शांति संभव नहीं है। विकास, बेहतर प्रशासन, शिक्षा और रोजगार के अवसर भी उतने ही जरूरी हैं। कई जनजातीय क्षेत्रों में उग्रवाद के प्रभाव में आई कमी इस बात का संकेत है कि सुरक्षा और समावेशी विकास को साथ लेकर चलना प्रभावी रणनीति साबित हो सकता है।

प्रतिनिधित्व से पैदा होता है अपनापन

विकास अवसर पैदा करता है, लेकिन प्रतिनिधित्व लोगों में जुड़ाव और विश्वास पैदा करता है।

इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक द्रौपदी मुर्मू का भारत की पहली जनजातीय राष्ट्रपति बनना है। मयूरभंज से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने की उनकी यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूत अभिव्यक्ति है।

यह करोड़ों जनजातीय नागरिकों को संदेश देती है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचने का रास्ता सभी के लिए खुला है।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहाड़पुर गांव यात्रा का महत्व और बढ़ जाता है। यह राष्ट्रपति मुर्मू के ससुराल गांव की किसी प्रधानमंत्री द्वारा पहली यात्रा थी। साथ ही यह उन दुर्लभ अवसरों में से एक था जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने संयुक्त रूप से जनजातीय धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का दौरा किया।

ऐसे अवसर केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं होते। वे यह संदेश देते हैं कि किसी समुदाय को पहचान केवल नीतियों और बजट से नहीं मिलती, बल्कि सम्मान और सार्वजनिक स्वीकृति से भी मिलती है।

 

राष्ट्रीय इतिहास में जनजातीय योगदान को उचित स्थान

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब जनजातीय योगदान को भारत की राष्ट्रीय कहानी के केंद्र में लाने का प्रयास हो रहा है।

कई जनजातीय नायक, आंदोलन और परंपराएं लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं पा सकीं, जबकि स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है।

भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। यह केवल सम्मान का प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत के महान जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय स्मृति में उनका उचित स्थान देने का प्रयास था।

इसी तरह जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित संग्रहालय और स्मारक भारत के इतिहास को अधिक व्यापक और समावेशी रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।

हाल ही में दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। राजनीतिक मतभेदों से अलग, जनजातीय अधिकारों और समुदायों के लिए योगदान देने वाले नेताओं को सम्मान देना इस बात का संकेत है कि जनजातीय योगदान को अब अधिक प्रमुखता दी जा रही है।

 

क्यों महत्वपूर्ण है मयूरभंज

मयूरभंज का महत्व इसी व्यापक बदलाव के संदर्भ में समझा जा सकता है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा जिन संथाल जाहेर और हो जाहेरा जैसे पवित्र स्थलों का दौरा किया गया, वे केवल धार्मिक स्थान नहीं हैं। ये जीवंत सांस्कृतिक संस्थाएं हैं, जहां आस्था, प्रकृति, इतिहास और सामुदायिक पहचान एक साथ जुड़ी हुई हैं।

बाहा, सोहराय और मागे परब जैसे प्रमुख त्योहार इन पवित्र स्थलों से गहराई से जुड़े हैं।

पीढ़ियों से संरक्षित ये पवित्र वन क्षेत्र मानव और प्रकृति के बीच संतुलन की उस सोच को दर्शाते हैं जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।

जब दुनिया आज पर्यावरण संरक्षण और स्थायी विकास की बात कर रही है, तब जनजातीय समुदाय सदियों से इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाए हुए हैं। जाहेर परंपरा सामुदायिक संरक्षण और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का एक प्राचीन उदाहरण है।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की संयुक्त यात्रा इसलिए केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र भारत में संथाल और हो समुदायों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को मिला एक बड़ा आधिकारिक सम्मान भी थी।

यह इस बात का संकेत है कि जनजातीय समुदायों को अब केवल उनकी समस्याओं के आधार पर नहीं, बल्कि उनके ज्ञान, संस्कृति और पर्यावरणीय समझ के आधार पर भी पहचाना जा रहा है।

भारत में जनजातीय नीति का बदलता स्वरूप

मयूरभंज का महत्व किसी एक यात्रा, समारोह या घोषणा तक सीमित नहीं है। यह भारत के जनजातीय समुदायों के प्रति बदलते नजरिये को दर्शाता है।

पिछले दशक में जनजातीय नीति धीरे-धीरे कल्याण से सशक्तिकरण, विकास से सम्मान और प्रतिनिधित्व से पहचान की ओर बढ़ी है।

सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के अवसर अभी भी जरूरी हैं, लेकिन अब कहानी केवल इतनी नहीं है।

लंबे समय तक जनजातीय भारत को इस नजरिये से देखा गया कि उसके पास क्या नहीं है। अब सोच बदल रही है और यह समझ विकसित हो रही है कि जनजातीय भारत देश को क्या देता है।

एक परिपक्व राष्ट्र केवल अपने समुदायों की कमजोरियों को दूर नहीं करता, बल्कि उनकी ताकत और योगदान का सम्मान भी करता है।

आज भारत के जनजातीय समुदायों को प्राचीन ज्ञान परंपराओं, पर्यावरण संरक्षण की समझ, सांस्कृतिक विविधता और सभ्यतागत विरासत के संरक्षक के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

इस अर्थ में मयूरभंज केवल एक सरकारी यात्रा का स्थान नहीं है, बल्कि यह उस बड़े राष्ट्रीय प्रयास का प्रतीक है जिसमें आदिवासी समुदायों को भारत की कहानी के किनारे नहीं, बल्कि उसके केंद्र में स्थान दिया जा रहा है।

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