
New Delhi : वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैचारिक संतुलन के तेज़ी से बदलते परिदृश्य में भारत-रूस संबंध एक ऐसे द्विपक्षीय रिश्ते के रूप में सामने आते हैं, जिसने समय, दबाव और परिस्थितियों की परीक्षा सफलतापूर्वक दी है। रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग इसके दृश्यमान स्तंभ हैं, लेकिन इस साझेदारी की असली ताक़त हमेशा से सांस्कृतिक निकटता, सिनेमा, शिक्षा और लोगों से लोगों के भावनात्मक जुड़ाव में निहित रही है।

इसी पृष्ठभूमि में डॉ. अनिल सिंह, एडिटर, STAR Views एवं एडिटोरियल एडवाइज़र, Top Story ने भारत की अपनी पहली यात्रा पर आईं एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को)—प्रसिद्ध रूसी टीवी पर्सनैलिटी और सांस्कृतिक राजनयिक—से एक विस्तृत बातचीत की। यह संवाद भारत-रूस संबंधों की वर्तमान स्थिति, रणनीतिक स्वायत्तता, सांस्कृतिक कूटनीति, डिजिटल युग में युवाओं से जुड़ाव और प्रस्तावित विश्व सार्वजनिक शिखर सम्मेलन की वैश्विक सोच को समग्र रूप से सामने रखता है।
डॉ. अनिल सिंह:
आपका STAR Views में स्वागत है। आप ऐसे समय में भारत आई हैं जब दुनिया गंभीर भू-राजनीतिक बदलावों से गुजर रही है। शुरुआत में आप अपने भारत आगमन के उद्देश्य और यहां अपने व्यापक एजेंडे के बारे में बताना चाहेंगी?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
धन्यवाद डॉ. सिंह। यहां आकर और आपसे संवाद करके मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। मुझे आपकी मॉस्को यात्रा आज भी स्पष्ट रूप से याद है, जब आपने राज कपूर की जन्मशती पर आयोजित भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया था। राज कपूर रूस में आज भी असाधारण लोकप्रियता और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक हैं।
यह मेरी भारत की पहली यात्रा है और यहां पहुंचते ही मैंने भारतीय समाज की गर्मजोशी, उदारता और मानवीय संवेदनशीलता को गहराई से महसूस किया है। मैं शुक्रवार को यहां आई और तब से हर अनुभव ने यह विश्वास और मजबूत किया है कि सच्चे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नींव मानवीय संपर्क से ही पड़ती है। इस यात्रा का उद्देश्य सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करना, लोगों से लोगों के रिश्तों को आगे बढ़ाना और वैश्विक स्तर पर नए सार्वजनिक मंचों की संभावनाओं को तलाशना है।
डॉ. अनिल सिंह:
भारत-रूस संबंधों को अक्सर समय-परीक्षित और सभ्यतागत रूप से गहरे बताया जाता है। बदलती वैश्विक व्यवस्था में आप इस साझेदारी को किस रूप में देखती हैं?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
मैं इसका उत्तर सांस्कृतिक और सार्वजनिक कूटनीति के दृष्टिकोण से देना चाहूंगी, क्योंकि यही मेरा कार्यक्षेत्र है। जब हम मॉस्को में राज कपूर को समर्पित रूसी-भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे, उसी दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया।
रूस के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क RT के भारत में अंग्रेज़ी भाषा सेवा के शुभारंभ की घोषणा हुई। बहुत जल्द इसके कार्यक्रम दिल्ली एयरपोर्ट जैसे सार्वजनिक स्थलों पर दिखाई देने लगे। यह एक अहम पहल थी, क्योंकि इससे भारतीय दर्शकों को रूसी पत्रकारों के माध्यम से रूस का दृष्टिकोण सीधे समझने का अवसर मिला।
इसी अवधि में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा की घोषणा ने भी इस रिश्ते की गहराई को और रेखांकित किया। इस यात्रा को भारतीय और रूसी मीडिया ने अत्यंत गरिमा और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया। भारत में हमारे राष्ट्रपति का जिस आत्मीयता से स्वागत हुआ, वह रूस के लोगों के लिए भावनात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था और इसने द्विपक्षीय रिश्तों की मजबूती को फिर से प्रमाणित किया।
डॉ. अनिल सिंह:
पश्चिमी दबावों के बावजूद भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी है। रूस में भारत की इस स्वतंत्र विदेश नीति को कैसे देखा जाता है?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
रूस भारत को एक पूर्णतः स्वतंत्र और संप्रभु वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है, और इसके लिए भारत के प्रति गहरा सम्मान है। भारत किसी भी गुट का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि राष्ट्रीय हित, दीर्घकालिक दृष्टि और रणनीतिक संतुलन के आधार पर निर्णय लेता है।
हमारा रिश्ता दशकों के विश्वास पर आधारित है, न कि अल्पकालिक राजनीतिक समीकरणों पर। रूस भारत को एक समान और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार मानता है—ऐसा साझेदार जो संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और आपसी सम्मान को सर्वोपरि रखता है। यही सोच इस रिश्ते को वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी स्थिरता प्रदान करती है।
डॉ. अनिल सिंह:
ऊर्जा सहयोग भारत-रूस संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ बन चुका है। क्या आपको लगता है कि यह सहयोग संतोषजनक दिशा में आगे बढ़ रहा है?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
हालांकि मेरा मुख्य कार्यक्षेत्र संस्कृति है, फिर भी मैं मानती हूं कि किसी भी साझेदारी में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। ऊर्जा सहयोग एक अत्यंत तकनीकी क्षेत्र है और इसका आकलन वहां कार्यरत विशेषज्ञों द्वारा बेहतर ढंग से किया जा सकता है।
फिर भी, व्यापक दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र में अभी भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं। दोनों देशों की क्षमताएं एक-दूसरे की पूरक हैं और यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा संस्थागत ढांचे मज़बूत बने रहें, तो ऊर्जा सहयोग और गहरा हो सकता है।
डॉ. अनिल सिंह:
यह भी कहा जाता है कि आज भारत-रूस सांस्कृतिक संबंध पहले जितने सशक्त नहीं रहे। इन्हें पुनर्जीवित करने के लिए आप क्या सुझाव देंगी?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
भारत और रूस का सांस्कृतिक इतिहास असाधारण रहा है। इसका एक सशक्त उदाहरण अफ़ानासी निकितिन हैं—15वीं शताब्दी के रूसी यात्री, जिन्होंने भारत की यात्रा की। मॉस्को में उनके नाम पर दिए जाने वाले अफ़ानासी निकितिन पुरस्कार और उनकी यात्रा पर आधारित फिल्म तीन समुद्रों के पार इस ऐतिहासिक संबंध को दर्शाती है।
आज समस्या यह है कि हम मानव-केंद्रित कहानियों और निरंतर सांस्कृतिक संवाद से दूर हो गए हैं। भारत आने की तैयारी के दौरान कई लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं भारत जाने से डरती नहीं हूं। यह सवाल अपने-आप में इस बात का संकेत था कि आधुनिक भारत को लेकर जागरूकता की कमी है।
इसीलिए सांस्कृतिक दूतों, छात्र आदान-प्रदान कार्यक्रमों और समकालीन कथाओं की आवश्यकता है। हमें भारत और रूस को केवल भू-राजनीतिक इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत समाजों के रूप में एक-दूसरे से फिर परिचित कराना होगा।
डॉ. अनिल सिंह:
लोगों से लोगों का संपर्क कभी भारत-रूस संबंधों की भावनात्मक रीढ़ था। नई पीढ़ी के लिए इस सॉफ्ट पावर को कैसे नया रूप दिया जा सकता है?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि आज के युवा जानकारी कैसे ग्रहण करते हैं। उनका संसार सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, पॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म से संचालित होता है। यदि हमें उनसे जुड़ना है, तो हमें उन्हीं प्रारूपों में संवाद करना होगा।
लंबी फिल्में और किताबें आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन युवाओं तक पहुंचने का पहला माध्यम नहीं रह गई हैं। लघु वीडियो, मिनी डॉक्यूमेंट्री, पॉडकास्ट और संवादात्मक मंच जिज्ञासा को जन्म दे सकते हैं।
साथ ही, ऐसे मंचों की आवश्यकता है जहां युवा जीवन, प्रेम और उद्देश्य जैसे गहरे प्रश्नों पर खुलकर चर्चा कर सकें। यही सोच विश्व सार्वजनिक शिखर सम्मेलन के पीछे है—एक ऐसा मंच जहां विभिन्न देशों के लोग शिक्षा, संस्कृति, स्वास्थ्य, खेल और साझा मानवीय चुनौतियों पर आमने-सामने संवाद कर सकें। आज के अस्थिर वैश्विक माहौल में संवाद और समझ अनिवार्य हो गए हैं।
डॉ. अनिल सिंह:
भविष्य की ओर देखते हुए, आपके एनजीओ की वैश्विक योजनाएं क्या हैं, विशेषकर भारत के संदर्भ में?
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को):
2026 हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष है। हम दूसरे विश्व सार्वजनिक शिखर सम्मेलन की तैयारी कर रहे हैं, जिसे मॉस्को या किसी अन्य वैश्विक राजधानी में आयोजित करने पर विचार हो रहा है।
इसके अतिरिक्त, हम क्षेत्रीय संस्करणों की भी योजना बना रहे हैं—बगदाद, ब्राज़ील के साल्वाडोर, वियना और अफ्रीका के कुछ देशों जैसे युगांडा, घाना या अंगोला में। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम भारत, विशेषकर दिल्ली में, एक बड़े विश्व सार्वजनिक शिखर सम्मेलन का आयोजन करना चाहते हैं।
भारत में होने वाला सम्मेलन आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक सहयोग, युवा आदान-प्रदान और व्यापार प्रदर्शनी जैसे विषयों पर केंद्रित होगा। हम भारत को वैश्विक संवाद का स्वाभाविक केंद्र मानते हैं।
निष्कर्ष
एलेना डोल्गोपोलोवा (मॉस्को) के साथ यह संवाद स्पष्ट करता है कि दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को जीवंत बनाए रखने में सांस्कृतिक कूटनीति की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। जब वैश्विक राजनीति अधिक लेन-देन आधारित होती जा रही है, तब लोगों-केंद्रित जुड़ाव—विशेषकर युवाओं के बीच—एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है।
आधुनिक संचार माध्यमों, सार्थक संवाद और विश्व सार्वजनिक शिखर सम्मेलन जैसे समावेशी मंचों पर उनका ज़ोर भारत-रूस संबंधों के लिए एक दूरदर्शी रोडमैप प्रस्तुत करता है। चुनौती केवल ऐतिहासिक मित्रता को बचाए रखने की नहीं, बल्कि उसे डिजिटल युग की नई पीढ़ी के लिए पुनर्परिभाषित करने की है।
— डॉ. अनिल सिंह
एडिटर, STAR Views
एडिटोरियल एडवाइज़र, Top Story





