Alzheimer research India: अल्जाइमर की पहचान और इलाज में भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता, स्वदेशी मॉलिक्यूल I-43 बना उम्मीद की किरण

Alzheimer research India: अल्जाइमर की पहचान और इलाज में भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता, स्वदेशी मॉलिक्यूल I-43 बना उम्मीद की किरण
नई दिल्ली, 22 फरवरी। अल्जाइमर बीमारी की पहचान और उपचार की दिशा में भारत ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘आई-43’ नामक एक अनूठा स्वदेशी मॉलिक्यूल विकसित किया है, जो न केवल इस गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी की शुरुआती पहचान में मदद कर सकता है, बल्कि उपचार की दिशा में भी कारगर साबित हो सकता है।
यह उपलब्धि देश के तीन प्रमुख संस्थानों के संयुक्त शोध का परिणाम है। इसमें आईआईटी बीएचयू के डॉ. ज्ञान प्रकाश मोदी, एम्स दिल्ली के डॉ. सरोज कुमार और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी की डॉ. सारिका गुप्ता की अहम भूमिका रही। शोध के अनुसार, अल्जाइमर एक प्रगतिशील और गंभीर बीमारी है, जो धीरे-धीरे याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और दैनिक जीवन की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है। यह डिमेंशिया का प्रमुख कारण मानी जाती है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि लक्षण सामने आने से कई वर्ष पहले मस्तिष्क में एमाइलॉयड-बीटा नामक हानिकारक प्रोटीन जमा होना शुरू हो जाता है। इसके अलावा कोलिनेस्टरेज एंजाइम भी इस बीमारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्तमान में अल्जाइमर की पहचान के लिए पीईटी स्कैन और एमआरआई जैसी महंगी तकनीकों का सहारा लिया जाता है, जो हर मरीज की पहुंच में नहीं हैं। कुछ जांचों में रेडिएशन का खतरा भी होता है और ब्लड टेस्ट अभी तक पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माने गए हैं।
स्वदेशी मॉलिक्यूल ‘आई-43’ की खासियत यह है कि यह ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर मस्तिष्क में मौजूद एमाइलॉयड-बीटा प्लाक की पहचान विशेष रोशनी के माध्यम से कर सकता है। इतना ही नहीं, यह बीमारी की प्रगति को ट्रैक करने के साथ उस एंजाइम को भी अवरुद्ध करने में सक्षम है, जो याददाश्त से जुड़े न्यूरोट्रांसमीटर एसिटाइलकोलाइन को तोड़ता है। इस प्रकार यह मॉलिक्यूल ‘थेरेनोस्टिक’ यानी डायग्नोसिस और थेरेपी दोनों में सहायक भूमिका निभा सकता है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका Nature Communications में प्रकाशित हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में अल्जाइमर का निदान अक्सर अंतिम चरण में होता है, जिससे उपचार सीमित और कम प्रभावी रह जाता है। ऐसे में यह खोज शुरुआती पहचान और बेहतर प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म भविष्य में कैंसर, संक्रामक रोगों और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के लिए भी थेरेनोस्टिक कैंडिडेट विकसित करने में उपयोगी साबित हो सकता है। इस महत्वपूर्ण शोध को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और एएनआरएफ का समर्थन प्राप्त हुआ है।





