Longevity Science: उम्र बढ़े, शरीर रहे जवान, एम्स में लॉन्जिविटी साइंस पर मंथन, हेल्थस्पैन बढ़ाने पर जोर

Longevity Science: उम्र बढ़े, शरीर रहे जवान, एम्स में लॉन्जिविटी साइंस पर मंथन, हेल्थस्पैन बढ़ाने पर जोर

नई दिल्ली, 10 अगस्त: इंसान की उम्र बढ़ना प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन शरीर किस गति से बूढ़ा होता है और बढ़ती उम्र में व्यक्ति कितने लंबे समय तक स्वस्थ, सक्रिय और आत्मनिर्भर रह सकता है, इस पर अब चिकित्सा विज्ञान गंभीरता से काम कर रहा है। लॉन्जिविटी साइंस का उद्देश्य केवल इंसान की आयु बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन के वर्षों यानी ‘हेल्थस्पैन’ को बढ़ाना है।

इसी विषय पर सोमवार को एम्स दिल्ली में ‘इंटीग्रेटिव वर्कशॉप ऑन द साइंस एंड आर्ट ऑफ लॉन्जिविटी’ का आयोजन किया गया। इसमें विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने स्वस्थ उम्र बढ़ने की प्रक्रिया, शरीर में उम्र से जुड़े बदलावों, जीवनशैली, जैविक उम्र और नई चिकित्सा तकनीकों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।

विशेषज्ञों ने जोर दिया कि लंबी जिंदगी का वास्तविक महत्व तभी है, जब व्यक्ति अधिक उम्र में भी शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहे और रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर न हो। मेडिकल साइंस में इसी अवधारणा को ‘हेल्थस्पैन’ कहा जाता है। यानी व्यक्ति कितने साल जीवित रहता है, इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि वह कितने वर्षों तक स्वस्थ और सक्रिय रहता है।

एम्स के नेशनल सेंटर फॉर एजिंग और बायोफिजिक्स विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में उम्र बढ़ने की जैविक प्रक्रिया से लेकर जीवनशैली और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों तक पर चर्चा की गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि उम्र बढ़ने के दौरान शरीर में कई स्तरों पर बदलाव होते हैं, जिनका असर व्यक्ति की सेहत और कार्यक्षमता पर पड़ सकता है।

कार्यशाला में ‘जॉम्बी सेल’ यानी सेनेसेंट कोशिकाओं पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ शरीर में ऐसी कोशिकाएं जमा हो सकती हैं, जो सामान्य तरीके से काम नहीं करतीं और शरीर में सूजन बढ़ाने वाली प्रक्रियाओं में भूमिका निभा सकती हैं। इन कोशिकाओं को निशाना बनाने वाली सिनोलिटिक दवाओं पर अभी शोध और क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं। हालांकि, इनके व्यापक चिकित्सीय इस्तेमाल को लेकर अभी और वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता है।

जैविक उम्र का आकलन भी लॉन्जिविटी साइंस का महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभर रहा है। एपिजेनेटिक क्लॉक जैसी तकनीकों के माध्यम से यह समझने की कोशिश की जा रही है कि किसी व्यक्ति का शरीर उसकी वास्तविक उम्र की तुलना में कितनी तेजी से बूढ़ा हो रहा है। इससे भविष्य में उम्र से जुड़ी बीमारियों के जोखिम और स्वस्थ उम्र बढ़ने की रणनीतियों को समझने में मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों ने स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए रोजमर्रा की जीवनशैली को सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक बताया। डॉ. अविनाश चक्रवर्ती, डॉ. एबी डे, डॉ. प्रमोद के मेहता और डॉ. ज्योतिर्मोय बनर्जी ने नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव को नियंत्रित रखने को स्वस्थ उम्र बढ़ने की बुनियाद बताया।

विशेषज्ञों के अनुसार सप्ताह में करीब 150 मिनट मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि और कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकती है। इसके साथ संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन को लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

कार्यशाला में ‘एंटी-एजिंग’ के नाम पर बाजार में उपलब्ध विभिन्न उपचारों और तकनीकों को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी गई। विशेषज्ञों ने कहा कि स्टेम सेल, पेप्टाइड्स और कई नई दवाओं पर शोध जारी है, लेकिन हर उपचार या तकनीक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। कई विकल्प अभी शोध और क्लिनिकल परीक्षण के चरण में हैं।

विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी कि केवल ‘एंटी-एजिंग’ के दावों के आधार पर किसी उपचार या दवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। किसी भी तरह के चिकित्सा उपचार को अपनाने से पहले योग्य डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

डॉ. शर्मिष्ठा डे ने कहा कि बुढ़ापे को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन स्वस्थ बुढ़ापे की तैयारी आज से शुरू की जा सकती है। लॉन्जिविटी साइंस का मूल उद्देश्य भी यही है कि बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति की गुणवत्ता वाली जिंदगी लंबे समय तक बनी रहे और वह अधिक वर्षों तक स्वस्थ, सक्रिय तथा आत्मनिर्भर रह सके।

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