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New Delhi : संस्कृत भारत का प्राण, ‘प्रणव’ बना नवजागरण का केंद्र- मोहन भागवत

New Delhi : अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर राजधानी दिल्ली में संस्कृत के प्रचार-प्रसार को समर्पित ‘प्रणव’ केंद्रीय कार्यालय का भव्य लोकार्पण किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस अवसर पर कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि की आधारशिला है। उन्होंने इसे भारत का प्राण बताते हुए कहा कि देश को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य है, क्योंकि इसमें भारत की ज्ञान-परंपरा, दर्शन और जीवन-मूल्य समाहित हैं।

उन्होंने कहा कि ‘प्रणव’ सृष्टि के मूल नाद का प्रतीक है और इस नाम के साथ शुरू हुआ यह कार्य निश्चित रूप से पूर्णता की ओर अग्रसर होगा। संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से अन्य भाषाओं को भी सहजता से सीखा जा सकता है। संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी है।

कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य में केवल रुचि पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उद्देश्य की स्पष्ट समझ, धैर्य और निरंतरता आवश्यक है। संस्कृत के कार्य को भी निरंतर आगे बढ़ाने की जरूरत है, ठीक वैसे ही जैसे श्वास-प्रश्वास बिना रुके चलता रहता है।

संस्कृत सीखने के संदर्भ में उन्होंने संभाषण पद्धति को सबसे सरल और प्रभावी उपाय बताया। उनके अनुसार, बोलचाल के माध्यम से संस्कृत को आसानी से सीखा जा सकता है और इसे लोकभाषा के रूप में स्थापित करना आवश्यक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संस्कृतभारती का उद्देश्य सभी भाषाओं को साथ लेकर चलना है, जिससे सांस्कृतिक एकात्मता को बल मिलेगा।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संदेश भी पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने ‘प्रणव’ कार्यालय के लोकार्पण को भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल अतीत की ही नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की भी सशक्त भाषा है।

कार्यक्रम में वैदिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और यज्ञ का आयोजन किया गया। इसके पश्चात ‘प्रणव’ भवन का लोकार्पण कर उसका अवलोकन किया गया। कार्यक्रम में देश-विदेश से आए विद्वानों, शिक्षाविदों और संस्कृत प्रेमियों की उपस्थिति ने इसे एक ऐतिहासिक अवसर बना दिया।

संस्कृतभारती के पदाधिकारियों ने बताया कि संगठन की स्थापना 1981 में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के उद्देश्य से हुई थी, जो आज एक वैश्विक आंदोलन का रूप ले चुका है। ‘प्रणव’ भवन लगभग 50 हजार वर्ग फुट में फैला आधुनिक और पारंपरिक स्वरूप का संगम है, जहां विभिन्न विषयों पर परामर्श और प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध होंगी। यह केंद्र संस्कृत के प्रचार-प्रसार, शिक्षकों के प्रशिक्षण और वैश्विक शोध के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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