Uttar Pradesh : बेटियों ने निभाया अंतिम फर्ज, हापुड़ में परंपराओं को चुनौती देती भावुक घटना

Hapur News : हापुड़ के लालपुर गांव में एक ऐसी घटना सामने आई जिसने समाज की सोच को झकझोर दिया। 85 वर्षीय हरनंदी देवी के निधन के बाद जहां उनके चार बेटों ने अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार कर दिया, वहीं उनकी दोनों बेटियां विमलेश और शगुन ने आगे बढ़कर मां की अंतिम यात्रा को सम्मानपूर्वक पूरा किया। बेटियों ने न केवल अर्थी को कंधा दिया बल्कि श्मशान घाट पर मुखाग्नि देकर पारंपरिक मान्यताओं को भी चुनौती दी।

हरनंदी देवी लंबे समय से बीमार चल रही थीं और 17 अप्रैल को उनकी हालत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। नौ दिनों तक वेंटिलेटर पर जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने के बाद 26 अप्रैल को उन्होंने अंतिम सांस ली। मां के निधन के बाद बेटियां उनका पार्थिव शरीर लेकर पैतृक गांव पहुंचीं, जहां बेटों की अनुपस्थिति ने सबको हैरान कर दिया।

ग्रामीणों के सामने जब कोई विकल्प नहीं बचा तो बेटियों ने ही साहस दिखाया और मां की अंतिम यात्रा की पूरी जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान गांव के लोगों की आंखें नम हो गईं और उन्होंने बेटियों के इस कदम की सराहना की। शगुन ने बताया कि उनके पिता भारतीय वायुसेना में थे और 1987 में उनके निधन के बाद हरनंदी देवी ने अकेले ही छह बच्चों का पालन-पोषण किया था। लेकिन बुढ़ापे में जब उन्हें सहारे की जरूरत थी, तब बेटों ने साथ छोड़ दिया।

बेटियों का आरोप है कि उनके भाइयों ने मां की कृषि भूमि अपने नाम करा ली और उन्हें अकेला छोड़ दिया। पिछले कई वर्षों से हरनंदी देवी अपनी बेटियों के साथ ही रह रही थीं। उन्होंने पहले ही लिखित रूप में इच्छा जताई थी कि उनका अंतिम संस्कार बेटियां ही करें और बेटियों ने मां की इस इच्छा का सम्मान किया।

लालपुर गांव की यह घटना समाज के लिए एक आईना बनकर सामने आई है, जहां बेटियों ने यह साबित कर दिया कि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता किसी एक लिंग तक सीमित नहीं होती। यह कहानी न केवल भावुक करती है बल्कि यह भी संदेश देती है कि बेटियां हर परिस्थिति में अपने माता-पिता का सबसे मजबूत सहारा बन सकती हैं।

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