TB Crisis: टीबी का संकट, समय पर जांच और इलाज अब भी चुनौती
नई दिल्ली, 20 अगस्त। टीबी यानी तपेदिक सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारी नहीं है, बल्कि इसका असर मरीज और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। बीमारी की समय पर पहचान न होना, जांच में देरी, इलाज बीच में छोड़ देना, कुपोषण और सामाजिक कलंक आज भी टीबी के खिलाफ लड़ाई में बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। इन चुनौतियों से निपटने और टीबी उन्मूलन की दिशा में आगे की रणनीति तैयार करने के लिए नीति आयोग ने 19 अगस्त को ‘टीबी : आगे की राह’ विषय पर उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की।
बैठक में विशेषज्ञों ने टीबी की जल्द पहचान और मरीजों तक समय पर उपचार पहुंचाने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बीमारी की शुरुआती अवस्था में पहचान होने से न केवल मरीज को गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं से बचाया जा सकता है, बल्कि संक्रमण को दूसरे लोगों तक फैलने से भी रोका जा सकता है। इसके लिए आसान, सटीक और समयबद्ध जांच व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
विशेषज्ञों ने लोगों से टीबी के संभावित लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की। लंबे समय तक खांसी, बुखार, रात में पसीना आना, अचानक वजन कम होना और लगातार कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सकीय जांच कराना महत्वपूर्ण है। समय पर बीमारी की पुष्टि होने के बाद पूरा उपचार करना भी उतना ही जरूरी है।
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि टीबी के मरीजों के लिए केवल दवाओं की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। कुपोषण और आर्थिक कठिनाइयां कई बार मरीज के इलाज को प्रभावित करती हैं। पर्याप्त पोषण नहीं मिलने से मरीज के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है और इलाज पूरा करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में पोषण सहायता और सामाजिक सुरक्षा को टीबी उपचार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की जरूरत बताई गई।
नीति आयोग की बैठक में टीबी उन्मूलन के लिए स्क्रीनिंग, डायग्नोस्टिक्स, उपचार, रोकथाम, पोषण, सामाजिक सुरक्षा और तकनीक को प्रमुख आधार के रूप में चिन्हित किया गया। विशेषज्ञों ने इन सभी क्षेत्रों को एक साथ मजबूत करने की आवश्यकता बताई, ताकि बीमारी की पहचान से लेकर मरीज के पूर्ण उपचार तक की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनाई जा सके।
बैठक की संयुक्त अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य प्रो. (डॉ.) एम. श्रीनिवास, स्वास्थ्य सचिव पुण्या सलिला श्रीवास्तव और आईसीएमआर महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने की। बैठक में टीबी के मौजूदा संकट और उसके समाधान के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने पर विचार-विमर्श किया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, टीबी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई के लिए बीमारी को केवल चिकित्सकीय समस्या के रूप में देखने के बजाय मरीज के पोषण, आर्थिक स्थिति और सामाजिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा। समय पर जांच, पूरा इलाज, रोकथाम और सामाजिक सहयोग के जरिए टीबी के कारण होने वाली स्वास्थ्य और आर्थिक परेशानियों को कम किया जा सकता है।


