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फ्लोरोसिस की रोकथाम में हड्डी रोग विशेषज्ञ बन सकते हैं मददगार

-हाथ पैरों में टेढ़ापन या जिगजैग शेप के चलते विकलांगता में हो रहा इजाफा

नई दिल्ली, 13 नवम्बर: भारत में फ्लोराइड विषाक्तता के चलते प्रतिवर्ष लाखों लोग ना सिर्फ दांतों में पीलापन, कालापन और खोखलापन आने की समस्या से पीड़ित हो रहे हैं। बल्कि आकर्षक मुस्कान से भी वंचित हो रहे हैं। वहीं, हाथ -पैर और रीढ़ की हड्डियों का टेढ़ापन व खोखलापन उन्हें स्थायी विकलांगता का शिकार बना रहा है।

यह जानकारी एम्स दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर फ्लोराइड रिसर्च सम्मेलन के दूसरे दिन सामने आई। इस दौरान किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (लखनऊ) के पब्लिक हेल्थ डेंटिस्ट्री के अध्यक्ष डॉ विनय गुप्ता ने बताया कि फ्लोराइड युक्त पानी के रंग और स्वाद में किसी किस्म का बदलाव नहीं होने के चलते व्यक्ति लगातार इसका सेवन करता रहता है जो दीर्घावधि में उसके शरीर की हड्डियों में जमा हो जाता है। फिर उसे हाथ, पैर और कमर की हड्डी में दर्द की समस्या होने लगती है। कमर झुकने के साथ हाथ -पैर की हड्डियों की आकृति में बदलाव आने लगते हैं। ऐसे में पीड़ित अस्पताल के हड्डी रोग विभाग में पहुंचते हैं। वहां, मरीज की स्क्रीनिंग करने के बजाय दर्द निवारक दवा और सामान्य उपचार ही दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, अगर ऑर्थो के डॉक्टर उक्त शिकायत वाले मरीजों को उनके रिहायशी क्षेत्र के आधार पर भी चिकित्सकीय परामर्श प्रदान करें तो फ्लोरोसिस की समस्या में कमी लाई जा सकती है। चूंकि यह अर्ली स्टेज पर ही उपचार योग्य है। उसके बाद मरीज के शरीर में फ्लोरोसिस बना रहता है। डॉ गुप्ता ने कहा, ऐसे मरीजों की पहले मूत्र जांच हो। रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर मरीज द्वारा पिये जा रहे पानी की जांच, रक्त जांच (फ्लोराइड टेस्ट) और कलाई का एक्स रे भी होने चाहिए। इस स्क्रीनिंग से जहां फ्लोरोसिस को फर्स्ट स्टेज पर ही डिटेक्ट किया जा सकेगा। वहीं, मरीज को स्थायी विकलांगता से भी बचाया जा सकेगा।

वहीं, डॉ विनय गुप्ता ने कहा कि मरीज में फ्लोरोसिस की पहचान होने के बाद उसे विटामिन सी, एंटी ऑक्सी डाइट, मल्टी विटामिन और फिल्टर या आरओ वाले पेयजल का सेवन करना चाहिए। इससे मरीज की हड्डियों में जमा हो चुके फ्लोराइड की अतिरिक्त मात्रा को शरीर से बाहर निकालने में मदद मिलेगी। इस दौरान मरीज को काला नमक और चाय पत्ती के सेवन से बचना चाहिए। इससे मरीज के शरीर में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ जाती है जो सेहत के लिए नुकसानदायक साबित होती है।

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