Delhi LS Seats: दिल्ली में कितना सफल होगा बीजेपी का दांव?

Delhi LS Seats: दिल्ली के अपने पाँच लोकसभा सदस्यों का टिकट काटकर भारतीय जनता पार्टी ने एक तरह से दिल्ली वालों को चौंका दिया है। पार्टी के इस कदम की आलोचना अगर आम आदमी पार्टी नहीं करती तो आश्चर्य होता। आम आदमी पार्टी चुटकी ले रही है कि क्या मान लिया जाए कि ये सांसद नकारा थे?

कांग्रेस का सुर भी कुछ वैसा ही है। वैसे ख़ुद बीजेपी के अंदरूनी हलके में भी पूछा जा रहा है कि आख़िर दिल्ली के दिग्गज डॉ हर्षवर्धन और रमेश बिधूड़ी के टिकट क्यों काटे गए? टिकट कटते ही डॉ हर्षवर्धन ने तो राजनीति से ही सन्यास की घोषणा कर दी जबकि बीजेपी का बड़ा वोट बैंक जाट समाज भी अपने नेता साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को भी बदले जाने से दुखी हो सकता है।

दिल्ली में अरसे से माना जा रहा था कि नई दिल्ली की सांसद मीनाक्षी लेखी को ज़रूर बदला जाएगा। इसी तरह मनोज तिवारी भी दिल्ली बीजेपी के पारंपरिक पंजाबी, बनिया और स्थानीय आधार वोट बैंक के निशाने पर रहे। लेकिन जिस तरह उन्हें तवज्जो दी गई है, उससे साफ़ है कि पार्टी आलाकमान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रवासियों के समर्थन के महत्व को समझने लगा है। इससे दिल्ली बीजेपी की राजनीति पर पारंपरिक रूप से प्रभावी रहे वर्ग को भी संदेश देने की कोशिश की गई है कि दिल्ली की बदली हुई डेमोग्राफ़ी को समझते हुए अपनी सोच बदलें।

नई दिल्ली से मीनाक्षी की जगह पर बांसुरी स्वराज को मौक़ा देने का मतलब साफ़ है कि पार्टी केजरीवाल के सामने संयत और युवा नेतृत्व को उभारना चाहती है। रमेश बिधूड़ी और प्रवेश वर्मा की शिकायतें आलाकमान को मिलती रही हैं। दोनों के बारे में कहा जाता रहा है कि अपने क्षेत्र के एक वर्ग के लोगों से या तो वे मिलते नहीं थे या फिर उन्हें अनदेखा करते थे। रमेश बिधूड़ी संसद में अपनी बदज़ुबानी को लेकर विपक्षी निशाने पर भी रहे। उनकी छवि भी दबंग की रही है।

हालाँकि उनकी जगह पर लाए गए रामवीर विधूड़ी कभी जनता दल और फिर लोक ज़नशक्ति पार्टी में रहे हैं। बेशक आज वे बीजेपी में हैं लेकिन पार्टी का कोर कार्यकर्ता उन्हें उस तरह स्वीकार नहीं करता, जैसे पारम्परिक संघ पृष्ठभूमि के बीजेपी नेताओं को स्वीकार करता है। चुनाव अभियान के दौरान इस ओर भाजपा को विशेष ध्यान देना पड़ेगा। प्रवेश वर्मा के न रहने से अगर किसी ने राहत की सांस ली है तो वे हैं महाबल मिश्र जो अब आम आदमी पार्टी से उम्मीदवार हैं। वे ख़ुद मान रहे थे कि प्रवेश वर्मा के चलते उनका चुनावी समर कठिन है।

चाँदनी चौक से जिन डॉ. हर्षवर्धन को हटाया गया है, वे दिल्ली बीजेपी के सर्वाधिक लोकप्रिय चेहरे रहे हैं। पार्टी की अंदरूनी राजनीति में उनकी अगुआई को दो-दो बार किनारे लगा दिया गया। टिकट कटने से वे निराश भी हैं। उन्होंने राजनीति से संन्यास का ऐलान भी कर दिया है। उनकी जगह जिन प्रवीण खंडेलवाल को चाँदनी चौक से उम्मीदवार बनाया गया है, वह भी विद्यार्थी परिषद के सदस्य रहे हैं। बनिया वर्ग के हैं और कारोबारियों में उनका असर भी है।

दिल्ली में इस बार बीजेपी का मुक़ाबला आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन से है। आम आदमी पार्टी ने अपने चार उम्मीदवार उतार दिए हैं, जबकि कांग्रेस ने अपने तीनों उम्मीदवारों का नाम घोषित नहीं किया है। पिछले आम चुनाव में बीजेपी ने हर सीट पर पचास प्रतिशत से ज़्यादा वोट हासिल किए थे। शायद यही वजह है कि पार्टी अपने उम्मीदवारों को बदलने का जोखिम उठा रही है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर बार पिछले नतीजे दोहराए ही जायें, इसलिए हर पार्टी को ज़्यादा सावधान रहना होगा।

तीसरी बार सरकार बनाने को लेकर बीजेपी ने सारे घोड़े खोल रखे हैं। हर कार्यकर्ता को कम से कम 50 वोट बढ़ाने का ज़िम्मा दिया गया है। इसके बावजूद थोक में टिकट काटे जाने से भितरघात और अनदेखी का भी ख़तरा होगा। जिनके टिकट काटे गए हैं, खुले तौर पर भले ही अपना ग़ुस्सा न जता रहे हों, लेकिन सच है कि वे ग़ुस्से और क्षोभ से भरे हैं। बीजेपी इस नज़रिए से अपने लोगों को साधने की कोशिश कर ही रही होगी, लेकिन क्या होगा यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेगा।

वहीं काँग्रेस और आम आदमी पार्टी की कोशिश बीजेपी के अन्तर्विरोध को उभारने की है। उन्हें लगता है कि बीजेपी का अंतर्विरोध जितना उभरेगा, उतना ही उनके लिए फ़ायदेमंद होगा। लेकिन बीजेपी की छवि अनुशासित पार्टी की है, इसलिए सतह पर अंदरूनी असंतोष के आने की गुंजाइश कम ही है।

बीजेपी को प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से उपजे समर्थन पर ज़्यादा भरोसा है, वहीं केजरीवाल को अपनी लोकलुभावन योजनाओं पर विश्वास है। हालाँकि जिस तरह के उम्मीदवार उन्होंने उतारे हैं, उनसे चुनावी समर में बहुत भरोसा नहीं जगता। कुछ जानकार तो यहाँ तक दावा कर रहे हैं कि केजरीवाल दिल्ली के नतीजे समझ गये हैं, इसलिए उनका पूरा फ़ोकस पंजाब पर है। जबकि कांग्रेस तो दिल्ली में लड़ती हुई भी नहीं दिख रही है। जबकि 2019 के चुनावों में वह दिल्ली की हर सीट पर दूसरे नंबर पर थी।

जहां तक टिकट कटने पर नेताओं और समर्थकों में असंतोष की बात है तो यहां ध्यान रखना होगा कि बीजेपी कार्यकर्ताओं की एक ख़ासियत है कि वे आख़िर में पार्टी के साथ खड़े हो ही जाते हैं। इसलिए बीजेपी नेताओं को उम्मीद है कि वो दिल्ली में 2019 की जीत को ही दोहरायेंगे। लेकिन इन पांच सालों में यमुना में बहुत पानी बह चुका है।

कांग्रेस और आप के गठजोड़ को हराने के लिए बीजेपी को इस बार सवाई मेहनत करनी होगी। उन्हें अपना वोट प्रतिशत न सिर्फ बरकरार रखना होगा बल्कि उसे बढाना भी होगा। दिल्ली में नये उम्मीदवारों पर लगाया बीजेपी का दांव सफल होता है या असफल, वह इसी बात पर निर्भर करेगा।

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