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Greater Noida water problem: 70 करोड़ खर्च के बाद भी ग्रेटर नोएडा में दूषित पानी से लोग परेशान, कई सेक्टरों में TDS 900 के पार

Greater Noida water problem: 70 करोड़ खर्च के बाद भी ग्रेटर नोएडा में दूषित पानी से लोग परेशान, कई सेक्टरों में TDS 900 के पार

ग्रेटर नोएडा में करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद साफ पानी की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। शहर के कई सेक्टरों, सोसायटियों और गांवों में रहने वाले लोग आज भी दूषित पानी और अनियमित जल आपूर्ति से जूझ रहे हैं। हालात यह हैं कि अधिकांश घरों में बिना आरओ के पानी पीना लगभग असंभव हो गया है। दूसरी ओर प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि बेहतर जलापूर्ति व्यवस्था के लिए पिछले एक साल में 70 करोड़ 41 लाख रुपये से अधिक खर्च किए गए, लेकिन इसके बावजूद लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है।

जानकारी के मुताबिक ग्रेटर नोएडा के कई सेक्टरों और आवासीय सोसायटियों में सोमवार को भी पानी का टीडीएस स्तर 900 के पार दर्ज किया गया, जो स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक माना जाता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इतने अधिक टीडीएस वाले पानी का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, लेकिन मजबूरी में लोगों को इसी पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इस स्थिति ने लोगों की परेशानी और नाराजगी दोनों को बढ़ा दिया है।

करीब दो महीने पहले भी शहर के कुछ सेक्टरों में दूषित पानी की समस्या गंभीर रूप से सामने आई थी। सेक्टर डेल्टा-1, डेल्टा-2 और अल्फा में सप्लाई किए गए दूषित पानी के कारण 100 से अधिक लोग बीमार पड़ गए थे। बताया गया कि कई लोगों को उल्टी, दस्त और पेट संबंधी शिकायतों के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। उस समय जांच में सामने आया था कि पानी की पाइपलाइन टूटने और सीवर लाइन के पास होने की वजह से गंदा पानी सप्लाई लाइन में मिल गया था।

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2025 में जलापूर्ति और उसके संचालन पर कुल 70,41,86,932 रुपये खर्च किए गए हैं। वहीं वर्ष 2024 में यह खर्च लगभग 83 करोड़ 81 लाख रुपये रहा था। हर साल इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बावजूद पानी की गुणवत्ता में कोई ठोस सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। इससे लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इतने बड़े बजट के बावजूद पानी की समस्या क्यों दूर नहीं हो पा रही।

शहर के कई हिस्सों में पानी की पाइपलाइन टूटना आम समस्या बन चुकी है। हाल ही में सेक्टर बीटा-1 स्थित विश्वभारती पब्लिक स्कूल के पास पानी की पाइपलाइन टूट गई थी, जिससे आसपास के घरों में गंदा पानी पहुंचने लगा। ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आने से लोगों की परेशानी बढ़ जाती है और जलापूर्ति व्यवस्था पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि शहर को बसे करीब 30 साल हो चुके हैं और कई जगहों पर पानी की पाइपलाइन इससे भी पुरानी हैं। पुरानी और जर्जर पाइपलाइन के कारण वे बार-बार टूट जाती हैं। कई बार फाइबर लाइन या सीएनजी पाइपलाइन बिछाने के दौरान होने वाली खुदाई में भी पानी की पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो जाती है, जिससे पानी की सप्लाई प्रभावित होती है और दूषित पानी घरों तक पहुंचने लगता है।

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पाइपलाइन को स्थायी रूप से ठीक करने के बजाय केवल अस्थायी मरम्मत कर दी जाती है। कुछ दिनों बाद फिर वही समस्या दोबारा सामने आ जाती है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते पाइपलाइन नेटवर्क को पूरी तरह बदला नहीं गया, तो आने वाले समय में समस्या और गंभीर हो सकती है।

इस पूरे मामले पर प्राधिकरण का कहना है कि शहर में जलापूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए नई योजना तैयार की जा रही है। इसके तहत शहर को ईस्ट और वेस्ट जोन में बांटकर जलापूर्ति के एकीकृत संचालन और रखरखाव की योजना बनाई जा रही है। इसके लिए विभिन्न कंपनियों से स्थलीय निरीक्षण कर सुझाव मांगे गए हैं और उन सुझावों के आधार पर जल्द ही टेंडर जारी किया जाएगा। योजना के तहत पूरे सिस्टम का संचालन और रखरखाव एक ही कंपनी को सौंपा जा सकता है ताकि पानी की आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर और व्यवस्थित बनाया जा सके।

हालांकि जब तक इन योजनाओं को जमीन पर लागू नहीं किया जाता, तब तक शहर के हजारों परिवारों को दूषित पानी की समस्या से जूझना पड़ सकता है। लोगों को उम्मीद है कि प्राधिकरण जल्द ही ठोस कदम उठाकर शहर को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराएगा।

ममूटी ने कहा कि उन्हें ‘मेगास्टार’ की उपाधि पसंद नहीं है, उन्हें लगता है कि उनके जाने के बाद लोग उन्हें याद नहीं रखेंगे

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