CBSE Three Language Formula: तीन भाषा फॉर्मूले में फंसे विदेशी भाषा शिक्षक, सीबीएसई नीति पर बढ़ा विवाद

CBSE Three Language Formula: तीन भाषा फॉर्मूले में फंसे विदेशी भाषा शिक्षक, सीबीएसई नीति पर बढ़ा विवाद
Central Board of Secondary Education द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत लागू किए गए तीन भाषा फॉर्मूले को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। नई व्यवस्था के चलते स्कूलों के सामने विदेशी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों के समायोजन की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। कई स्कूलों में फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ाने वाले शिक्षकों को अब जूनियर विंग में अन्य विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी दी जा रही है।
नई नीति के अनुसार कक्षा 9 के छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। सीबीएसई के निर्देशों के बाद कई स्कूलों में विदेशी भाषाओं की जगह संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं को शामिल किया जा रहा है। इस फैसले से विदेशी भाषा शिक्षकों के सामने नौकरी और भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है।
सूत्रों के अनुसार विदेशी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षक अब इस नियम में बदलाव की मांग को लेकर एक जून को Central Board of Secondary Education कार्यालय पहुंचेंगे। हालांकि अभी अधिकांश स्कूल इस मुद्दे पर खुलकर बयान देने से बच रहे हैं।
अभिभावकों और छात्रों का कहना है कि अचानक किए गए इस बदलाव से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि जिन छात्रों ने शुरुआती कक्षाओं से फ्रेंच, जर्मन या स्पेनिश जैसी भाषाएं चुनी थीं, उन्हें आगे अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और करियर में फायदा मिलने की उम्मीद थी। अब अचानक विदेशी भाषाओं को हटाकर क्षेत्रीय भाषाओं को अनिवार्य करना छात्रों के लिए मुश्किल पैदा कर रहा है।
अधिकांश स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को शामिल किया गया है। लेकिन कई अभिभावकों का कहना है कि जिन बच्चों ने पहले कभी संस्कृत नहीं पढ़ी, उनके लिए नई भाषा को समझना आसान नहीं होगा।
Gautam Buddh Nagar Parents Welfare Society के संस्थापक Manoj Kataria ने कहा कि बिना पर्याप्त तैयारी के इस व्यवस्था को लागू करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अभी सीबीएसई के पास कक्षा 9 की तीसरी भाषा के लिए पर्याप्त पुस्तकें और स्पष्ट मार्गदर्शन तक उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है और जो विद्यार्थी अपनी प्रांतीय भाषा में रुचि रखते हैं, उन्हें इसका अवसर मिलना चाहिए। लेकिन आज के दौर में उच्च शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक गतिविधियां वैश्विक स्तर पर हो रही हैं। ऐसे में विदेशी भाषाओं और टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना भी जरूरी है





