Noida Leaseback Case: 3,800 करोड़ के लीजबैक मामले में तत्कालीन सचिव हरीश चंद्र बर्खास्त

Noida Leaseback Case: 3,800 करोड़ के लीजबैक मामले में तत्कालीन सचिव हरीश चंद्र बर्खास्त

नोएडा। नोएडा प्राधिकरण से जुड़े करीब 3,800 करोड़ रुपये के लीजबैक मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की है। शासन ने नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन सचिव हरीश चंद्र को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया है। नियुक्ति विभाग की ओर से सोमवार को उनकी बर्खास्तगी का आदेश जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। हरीश चंद्र वर्तमान में खाद्य एवं रसद विभाग में कोलकाता स्थित स्थानिक प्रतिनिधि के पद पर तैनात थे।

हरीश चंद्र पर नोएडा प्राधिकरण में सचिव के पद पर तैनाती के दौरान प्राधिकरण की ऐसी जमीनों को नियमों के विपरीत लीजबैक कराने में भूमिका का आरोप लगा था, जो प्राधिकरण के कब्जे में आ चुकी थीं। विभागीय जांच में करीब 3 लाख 81 हजार 527 वर्गमीटर भूमि के नियम विरुद्ध लीजबैक की बात सामने आई थी। जांच में इस जमीन की बाजार कीमत करीब 3,800 करोड़ रुपये आंकी गई थी।

मामला वर्ष 2011 में नोएडा प्राधिकरण की ओर से किए गए लीजबैक से जुड़ा बताया जा रहा है। जांच में सामने आया कि एक्सप्रेसवे के आसपास शहदरा गांव से सटी जमीन के कुछ हिस्सों का लीजबैक ऐसे लोगों और निजी कंपनियों के नाम किया गया, जिन्हें इसके लिए पात्र नहीं माना गया था।

जांच के अनुसार, लीजबैक किए गए भूखंडों का क्षेत्रफल करीब 175 वर्गमीटर से लेकर 15,340 वर्गमीटर तक था। संबंधित मामलों में गांव के गैर-निवासी लोगों के साथ तीन निजी कंपनियों के नाम भी सामने आए। इस व्यवस्था को लेकर विभागीय जांच में नियमों के पालन पर सवाल उठाए गए।

लीजबैक नीति के तहत गांव के पात्र किसानों को उनकी भूमि से संबंधित शर्तों के अनुसार जमीन वापस देने की व्यवस्था थी। इसमें एक परिवार के नाम अधिकतम 450 वर्गमीटर तक भूमि लीजबैक किए जाने का प्रावधान बताया गया था। जांच में आरोप लगाया गया कि इस सीमा और पात्रता संबंधी नियमों की अनदेखी कर बड़े भूखंड बाहरी लोगों और निजी कंपनियों के नाम किए गए।

जांच के दायरे में आई जमीन एक्सप्रेसवे से सटे सेक्टर-140ए, 141, 142 और 143 के आसपास स्थित बताई गई है। इन क्षेत्रों में चौड़ी सड़कों से लगी जमीन होने के कारण उसका बाजार मूल्य भी काफी अधिक था। विभागीय जांच में पूरी भूमि की अनुमानित बाजार कीमत करीब 3,800 करोड़ रुपये बताई गई।

मामले की जांच तत्कालीन नोएडा प्राधिकरण की मुख्य कार्यपालक अधिकारी रितु माहेश्वरी को सौंपी गई थी। जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट शासन को भेजी गई। रिपोर्ट में हरीश चंद्र की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए और इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ी।

हरीश चंद्र के खिलाफ विभागीय कार्यवाही लंबे समय से चल रही थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की 3 सितंबर 2026 की कार्यवाही में भी उनके खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक प्रक्रिया का उल्लेख हुआ था। अदालत ने संबंधित सामग्री पर विचार के लिए अनुशासनिक प्राधिकारी को अंतिम निर्णय लेने के लिए समय दिया था। इसके बाद अब शासन स्तर पर उनकी सेवा समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है।

इस मामले में केवल सचिव स्तर के अधिकारी पर ही कार्रवाई नहीं हुई। लीजबैक प्रकरण की कार्रवाई के दौरान नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन नायब तहसीलदार मनोज कुमार को भी कार्यमुक्त किया गया था। इसके अलावा तत्कालीन विशेष कार्याधिकारी लैंड अजय श्रीवास्तव और हरीश चंद्र के खिलाफ निलंबन तथा विभागीय कार्रवाई की संस्तुति किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

जांच के दौरान यह भी सवाल उठा कि जिन लोगों और कंपनियों के नाम पर लीजबैक किया गया, वे संबंधित नीति के तहत पात्र थे या नहीं। जमीन के बड़े हिस्से का निजी संस्थाओं के नाम जाना और लीजबैक की सीमा से अधिक क्षेत्रफल के भूखंड दिए जाने को विभागीय जांच में महत्वपूर्ण बिंदु माना गया।

हरीश चंद्र वर्ष 2018 में भी निलंबित हो चुके हैं। उस समय वह मुजफ्फरनगर के अपर जिलाधिकारी पद पर तैनात थे। उनके खिलाफ एक पूर्व सैन्य अधिकारी को जेल भेजने के लिए पुलिस पर दबाव बनाने के आरोप लगे थे। बाद में इस मामले में हरीश चंद्र, उनकी पत्नी, बेटे और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

नोएडा लीजबैक मामले में हुई ताजा कार्रवाई के बाद अब यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। करीब चार लाख वर्गमीटर के आसपास बताई गई भूमि और उसकी हजारों करोड़ रुपये की अनुमानित बाजार कीमत के कारण यह प्रकरण लंबे समय से प्रशासनिक और जांच एजेंसियों के स्तर पर महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।

सरकार की ओर से हरीश चंद्र की बर्खास्तगी का आदेश जारी होने के बाद विभागीय कार्रवाई का एक प्रमुख चरण पूरा हो गया है। हालांकि, लीजबैक से जुड़े अन्य मामलों और संबंधित अधिकारियों तथा लाभार्थियों की भूमिका को लेकर जांच और कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग स्तर पर आगे बढ़ सकती है।

फिलहाल इस पूरे प्रकरण में जांच के दौरान सामने आए दस्तावेज, लीजबैक की प्रक्रिया, पात्रता के नियम और भूमि आवंटन से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। शासन की कार्रवाई के बाद अब इस मामले से जुड़े अन्य प्रशासनिक और कानूनी पहलुओं पर भी नजर बनी रहेगी।

 

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