Vande Mataram Row: वंदे मातरम गाने की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, केंद्र से दो हफ्ते में जवाब
नई दिल्ली। वंदे मातरम के सभी छह अंतरों को गाने की अनिवार्यता और ऐसा नहीं करने पर दंड के प्रावधान से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि फिलहाल अदालत यह तय नहीं कर रही कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए या उसके कितने अंतरे आधिकारिक रूप से गाए जाएं। सुनवाई का केंद्र यह सवाल है कि अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के आधार पर वंदे मातरम गाने से इनकार करने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।
पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। अदालत ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए और उन्हें संबंधित याचिका पर अपना पक्ष दाखिल करने के लिए कहा गया।
यह याचिका कर्नाटक संगीत के गायक टी. एम. कृष्णा से जुड़ी है। कृष्णा ने 2026 में संशोधित Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 और गृह मंत्रालय की ओर से जारी संबंधित निर्देशों को चुनौती दी है। याचिका में वंदे मातरम के छह अंतरों को निर्धारित आयोजनों में गाने से जुड़े निर्देशों तथा उनसे जुड़े दंडात्मक प्रावधानों पर संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में अदालत ने ऐसे स्कूली बच्चों को संरक्षण दिया था, जिन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं और अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। मौजूदा याचिका में इस पुराने फैसले के सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर भी चर्चा हुई।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत को लेकर कोई नया निर्णय देना नहीं है। पीठ का ध्यान इस प्रश्न पर है कि किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों और आपराधिक दंड के बीच कानूनी स्थिति क्या होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि जिस कानून में आपराधिक दंड का प्रावधान हो, उसमें अपराध माने जाने वाले आचरण की स्पष्ट परिभाषा जरूरी है। याचिका में वंदे मातरम की वैधानिक स्थिति और उससे जुड़े दंडात्मक प्रावधानों की स्पष्टता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
मामले में 2026 के संशोधन के तहत राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या ऐसे कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करने पर सजा से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, इसके तहत तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान बताया गया है। इसी व्यवस्था की संवैधानिक वैधता और दायरे पर अदालत के सामने सवाल है।
याचिका में यह तर्क भी दिया गया है कि वंदे मातरम के बाद के अंतरों में धार्मिक संदर्भ मौजूद हैं और इन्हें अनिवार्य रूप से गाने की स्थिति में धार्मिक स्वतंत्रता तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्न उठ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों पर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
सुनवाई के दौरान वंदे मातरम के आधिकारिक स्वरूप और दो या सभी छह अंतरों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई, लेकिन पीठ ने इस स्तर पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया। वहीं बहस के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच एक टिप्पणी को लेकर भी मतभेद सामने आया।
फिलहाल अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा है और मामले की आगे की सुनवाई सरकार का पक्ष मिलने के बाद होगी। इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल वंदे मातरम से जुड़े सरकारी निर्देशों के साथ-साथ अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित संवैधानिक अधिकारों की सीमा को लेकर है।


