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नई दिल्ली: ब्लू इकोनॉमी के क्षेत्र में भी योगदान देगी भारतीय नौसेना

नई दिल्ली: -चीन के अनुसंधान पोत और युद्धपोत की गतिविधियों पर रखी जा रही नजर

नई दिल्ली, 3 फरवरी : भारतीय नौसेना हर भारतीय की सेना है, जो समुद्री तटों और बंदरगाहों की सुरक्षा से लेकर अर्थव्यवस्था के विकास में भी योगदान दे रही है।

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इसी भावना के मद्देनजर भारतीय नौसेना ने अब ब्लू इकोनॉमी के क्षेत्र में भी योगदान देने का फैसला किया है। इसके तहत महासागरों, समुद्रों और तटों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में इजाफा किया जाएगा। ब्लू इकोनॉमी या नीली अर्थव्यवस्था एक स्थायी अर्थव्यवस्था है, जिसमें महासागरों के संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक विकास के लिए किया जाता है, लेकिन साथ ही उनका संरक्षण भी किया जाता है। नीली अर्थव्यवस्था का मकसद, महासागरों के संसाधनों का इस्तेमाल करके आर्थिक विकास करना और बेहतर आजीविका और नौकरियां मुहैया कराना है।

इस संबंध में नौसेना के पोत समुद्री सर्वेक्षण और अनुसंधान का कार्य कर रहे हैं। जिससे सीबेड माइनिंग और बायोप्रोस्पेक्टिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दिया जा सकेगा। इस प्रक्रिया से देश के समुद्री तटों के किनारे बसे शहरों और गांवों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया, भारत 12 प्रमुख बंदरगाह , 200 से अधिक अन्य बंदरगाह, 30 शिपयार्ड और विविध समुद्री सेवा प्रदाताओं का एक व्यापक केंद्र है। इसकी नीली अर्थव्यवस्था में शिपिंग, पर्यटन, मत्स्य पालन, तथा अपतटीय तेल एवं गैस अन्वेषण सहित कई क्षेत्र शामिल हैं।

साथ ही तटीय नवीकरणीय ऊर्जा, सीबेड माइनिंग और बायोप्रोस्पेक्टिंग जैसी गतिविधियां भी शामिल है। सीबेड माइनिंग का मतलब समुद्र तल से खनिजों और धातुओं को निकालने की औद्योगिक प्रक्रिया शुरू करना और बायोप्रोस्पेक्टिंग का मतलब प्रकृति से नए उत्पादों की खोज और उनका व्यावसायीकरण करना है। इन उत्पादों का इस्तेमाल फार्मास्यूटिकल, कृषि, कॉस्मेटिक और अन्य क्षेत्रों में किया जाता है। सेना के मुताबिक दुनिया में नीली अर्थव्यवस्था का वैश्विक मूल्य वर्तमान में लगभग 1.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष है, जो इसे दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा देता है। अनुमान बताते हैं कि यह 2030 तक दोगुना होकर 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा।

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