Election Commission SIR: SIR पर घमासान के बीच चुनाव आयोग का फैसला सर्वसम्मत, BJP ने राहुल गांधी के आरोपों पर उठाए सवाल
नई दिल्ली। चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR समेत आयोग के सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के साथ सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग का यह स्पष्टीकरण उन रिपोर्टों के बाद आया, जिनमें चुनाव आयुक्तों के बीच SIR से जुड़े कुछ मुद्दों पर आपत्तियां और अलग-अलग टिप्पणियां सामने आने का दावा किया गया था।
चुनाव आयोग के अनुसार बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में किसी प्रस्ताव या प्रक्रिया पर अलग-अलग राय, लिखित टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव आना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने कहा कि आंतरिक विचार-विमर्श में दिए गए सुझावों को अंतिम निर्णय से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। उसके मुताबिक SIR से जुड़े अंतिम निर्णय आयोग की सामूहिक मंजूरी के बाद ही लिए गए।
विवाद की शुरुआत उन रिपोर्टों के बाद हुई, जिनमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान मतदाता सूची और SIR प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न फैसलों पर कई बार आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्टों में मतदाता नाम जोड़ने, हटाने, बहाल करने और मतदाता डेटा से संबंधित प्रक्रियाओं सहित कई विषयों का उल्लेख किया गया। चुनाव आयोग ने हालांकि इन आंतरिक टिप्पणियों को अंतिम फैसलों से अलग बताया और कहा कि आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से हुए।
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने SIR और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी निशाना साधा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में गड़बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सार्वजनिक रूप से कई सवाल उठाए हैं।
राहुल गांधी के आरोपों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार किया। भाजपा नेताओं ने चुनाव आयोग की ओर से दिए गए सर्वसम्मति वाले स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कहा कि SIR से जुड़े अंतिम निर्णय किसी एक व्यक्ति के स्तर पर नहीं लिए गए। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया को लेकर लगाए जा रहे दावों का आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए।
भाजपा की ओर से यह भी कहा गया कि आयोग के भीतर किसी विषय पर चर्चा या आपत्ति दर्ज होना अपने आप में अंतिम फैसले से असहमति साबित नहीं करता। पार्टी नेताओं ने चुनाव आयोग के उस स्पष्टीकरण का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि सभी अंतिम निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए। भाजपा ने राहुल गांधी के आरोपों को राजनीतिक दावों के रूप में पेश किया है, जबकि कांग्रेस और विपक्षी दल SIR की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग सवाल उठाते रहे हैं।
SIR को लेकर विवाद केवल चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची में नामों के सत्यापन, नए मतदाताओं के पंजीकरण और अपात्र, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा चल रही है। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अद्यतन और अधिक सटीक बनाने के लिए पुनरीक्षण प्रक्रिया जरूरी है। वहीं विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया के दौरान वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका जताई है।
चुनाव आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली का बचाव करते हुए कहा है कि उसके सभी आदेश संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के तहत जारी किए जाते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि उसके भीतर अधिकारियों और आयुक्तों द्वारा सुधार संबंधी सुझाव देना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतिम निर्णय तय नियमों और आयोग की सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
इस विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की ओर से उनके खिलाफ सवाल उठाए गए हैं, जबकि भाजपा ने चुनाव आयोग का बचाव करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े फैसलों को आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
आयोग के भीतर कथित आपत्तियों को लेकर सामने आई रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया, उनमें मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण तथा डेटा प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि इन विषयों पर अधिकारियों और आयुक्तों की ओर से सुझाव अथवा सवाल उठाया जाना आंतरिक जांच और समीक्षा की प्रक्रिया का हिस्सा है।
SIR की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी इससे संबंधित कुछ मुद्दे पहुंचे हैं। दिल्ली में SIR के दौरान कुछ मतदाताओं को जारी किए गए ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नोटिस पर अदालत ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। इससे मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया, नोटिस जारी करने के आधार और मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के तरीके पर न्यायिक निगरानी भी सामने आई है।
वर्तमान विवाद में एक तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं, जबकि दूसरी तरफ विपक्षी नेता आंतरिक टिप्पणियों और कथित आपत्तियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा चुनाव आयोग की प्रक्रिया को वैधानिक और सामूहिक निर्णय पर आधारित बता रही है। ऐसे में SIR को लेकर राजनीतिक बहस के साथ-साथ मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उसके प्रशासनिक प्रभाव पर भी चर्चा जारी है।
अब इस पूरे विवाद में आगे चुनाव आयोग की ओर से आने वाली विस्तृत जानकारी और अदालतों में चल रही कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। SIR के तहत मतदाता सूची में होने वाले बदलाव, आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया और पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर आने वाले निर्णय से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।


