Chandigarh : मानसिक स्वास्थ्य का इलाज तब तक न टले, जब तक परिवार पूरी तरह टूटने की स्थिति में न पहुँच जाए- डॉ. बलबीर सिंह

Chandigarh : हम अक्सर तनाव को व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा मान लेते हैं। वह बहुत ज़्यादा चिंता करती है।वह हर बात को ज़रूरत से ज़्यादा सोचता है।वे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं।लेकिन तनाव एक स्वास्थ्य समस्या का रूप भी ले सकता है। चुनौती यह पहचानने की है कि सामान्य चिंता कब एक स्वास्थ्य समस्या में बदल जाती है।

न्यूरोटिक और तनाव संबंधी विकार केवल रोज़मर्रा के सामान्य तनाव तक सीमित नहीं होते। इनमें चिंता, डर, बेचैनी या शारीरिक लक्षणों के ऐसे गंभीर रूप शामिल होते हैं, जो व्यक्ति के दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें एंग्जायटी डिसऑर्डर, फोबिक डिसऑर्डर, ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर (OCD), गंभीर तनाव के प्रति प्रतिक्रिया और एडजस्टमेंट डिसऑर्डर शामिल हैं।

जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर (GAD) को दुनियाभर में पाए जाने वाले आम मानसिक विकारों में से एक माना जाता है, निदान के निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले लगभग 5 प्रतिशत लोग इससे प्रभावित होते हैं। हालाँकि, यह स्थिति का केवल एक हिस्सा हो सकता है, क्योंकि सामाजिक कलंक और इलाज तक पहुँच में आने वाली बाधाओं के कारण कई लोग उपचार नहीं लेते।

पंजाब की मुख्यमंत्री सेहत योजना (MMSY) में मानसिक स्वास्थ्य को ‘मेंटल डिसऑर्डर्स’ श्रेणी के तहत शामिल किया गया है। न्यूरोटिक, तनाव संबंधी और सोमैटोफॉर्म विकारों के लिए उपचार पैकेज को ‘रेगुलर प्रोसीजर’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा, “मानसिक स्वास्थ्य का इलाज तब तक नहीं टलना चाहिए, जब तक कोई परिवार आर्थिक या भावनात्मक रूप से पूरी तरह टूटने की स्थिति में न पहुँच जाए।”

डॉ. बलबीर सिंह ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए और आर्थिक बाधाओं के कारण लोगों को इलाज से वंचित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा, “एमएमएसवाई के तहत मानसिक स्वास्थ्य उपचार को शामिल करने का उद्देश्य इलाज को लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना और उन्हें समय रहते मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना है।”

डॉ. गगनदीप सेखों, एम.डी.(मनोचिकित्सा), कंसल्टेंट मनोचिकित्सक, सिविल अस्पताल बरनाला ने कहा, “मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को अक्सर तब तक नज़रअंदाज़ किया जाता है, जब तक वे दैनिक जीवन और सामान्य कामकाज को प्रभावित करना शुरू नहीं कर देतीं। उस समय तक इनसे निपटना अधिक मुश्किल हो सकता है।” उन्होंने कहा कि 18 से 45 वर्ष की आयु का वर्ग विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस उम्र में लोग करियर बनाने, रिश्तों को संभालने और आर्थिक ज़िम्मेदारियों को निभाने में व्यस्त रहते हैं।

जब दिमाग को आराम देना मुश्किल हो जाए

तनाव को एक अलार्म सिस्टम की तरह समझा जा सकता है। ख़तरा होने पर यह अलार्म बजना चाहिए और ख़तरा टलने के बाद शांत हो जाना चाहिए। डॉ. गगनदीप सेखों ने कहा, “तनाव संबंधी विकार में यही अलार्म समस्या बन जाता है। व्यक्ति को लगातार चिंता, डर, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, नींद में परेशानी या हर समय बेचैनी महसूस हो सकती है। चिंता शारीरिक लक्षणों का रूप भी ले सकती है, जैसे दिल की धड़कन तेज़ होना, पसीना आना, काँपना, जी मिचलाना और माँसपेशियों में खिंचाव।” विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भी एंग्जायटी डिसऑर्डर पारिवारिक जीवन, शिक्षा और कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके अलावा एक ऐसी स्थिति भी है, जिसे अक्सर ठीक से समझा नहीं जाता: इसमें शरीर मन में चल रही परेशानी को शारीरिक लक्षणों के रूप में व्यक्त करने लगता है। डॉ. गगनदीप सेखों ने बताया, “सोमैटोफॉर्म विकारों में शारीरिक लक्षण लगातार बने रह सकते हैं, भले ही जाँच में उनकी गंभीरता का पूरा कारण स्पष्ट न हो। इनमें दर्द, शरीर में भारीपन या पेट फूलना जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं।”

इसीलिए किसी व्यक्ति से यह कहना कि “यह सब आपके दिमाग की उपज है” समस्या को समझने का सही तरीका नहीं है। लक्षण वास्तविक होते हैं। मन तथा शरीर के बीच संबंध भी वास्तविक होता है।

कई बार इसकी शुरुआत किसी एक बड़ी घटना से हो सकती है—जैसे किसी करीबी की मृत्यु, अलगाव, बीमारी, आर्थिक संकट या जीवन में आया कोई बड़ा बदलाव। वहीं, कई बार यह लंबे समय से जमा हो रहे तनाव का परिणाम होता है: कई महीनों का काम का दबाव, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, अनिश्चितता और नींद की कमी धीरे-धीरे व्यक्ति की तनाव से निपटने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।

ऐसी स्थितियों में समय पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच महत्त्वपूर्ण हो सकती है। मुख्यमंत्री सेहत योजना (MMSY) पात्र परिवारों को योजना के तहत शामिल उपचार का लाभ लेने में मदद कर सकती है, ताकि इलाज का ख़र्च उनकी चिंताओं का एक और कारण न बने।

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