Aryan Warshney Achieves Grandmaster Title: आर्यन वार्ष्णेय बने भारत के 92वें और दिल्ली के आठवें शतरंज ग्रैंडमास्टर

Aryan Warshney Achieves Grandmaster Title: आर्यन वार्ष्णेय बने भारत के 92वें और दिल्ली के आठवें शतरंज ग्रैंडमास्टर
रिपोर्ट: रवि डालमिया
भारतीय शतरंज के इतिहास में एक और गौरवशाली अध्याय जुड़ गया है। युवा प्रतिभा आर्यन वार्ष्णेय ने आर्मेनिया में आयोजित प्रतिष्ठित आंद्रानिक मार्गार्यान मेमोरियल टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपना तीसरा और अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म पूरा किया। इस उपलब्धि के साथ वे भारत के 92वें शतरंज ग्रैंडमास्टर और दिल्ली के आठवें ग्रैंडमास्टर बनने का गौरव प्राप्त कर चुके हैं।
सिर्फ 21 वर्ष की आयु में, आर्यन ने एक राउंड बाकी रहते ही अपना अंतिम GM नॉर्म हासिल कर लिया, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके धैर्य, रणनीतिक कौशल और खेल की गहन समझ का प्रमाण है। यह उपलब्धि न केवल आर्यन के व्यक्तिगत करियर के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत को वैश्विक शतरंज मानचित्र पर लगातार आगे बढ़ते रहने वाले पावर हाउस के रूप में स्थापित करती है।
आर्यन वार्ष्णेय का परिवार रोहतास नगर, उत्तर पूर्वी दिल्ली में कबूल नगर में रहता है। जब सांसद मनोज तिवारी को इस उपलब्धि की जानकारी मिली, तो उन्होंने तुरंत आर्यन वार्ष्णेय को बधाई देने उनके निवास स्थान का दौरा किया। इस मौके पर उत्तर पूर्वी दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट (DM) अजय कुमार, नवीन शाहदरा जिला अध्यक्ष मास्टर विनोद, मीडिया प्रभारी नीलकांत बक्सी, पूर्व पार्षद सुमन लता नागर, आशीष तिवारी और अंकुर मलिक सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।
सांसद मनोज तिवारी और जिला मजिस्ट्रेट अजय कुमार ने आर्यन को माला पहनाकर और गुलदस्ता भेंट कर सम्मानित किया और भारतीय शतरंज के इतिहास में 92वें तथा दिल्ली के आठवें ग्रैंडमास्टर बनने पर शुभकामनाएं दी। सांसद ने कहा कि मात्र 21 वर्ष की उम्र में यह उपलब्धि उनके अथक परिश्रम, धैर्य और रणनीतिक कौशल का प्रमाण है। यह सफलता देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और शतरंज जगत में एक गौरवपूर्ण क्षण को दर्शाती है।
आर्यन ने मात्र सात वर्ष की उम्र में शतरंज की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने यह कला अपने पिता गौरव वार्ष्णेय से सीखी, जो उनके कोच, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत रहे। आर्यन ने कभी पेशेवर कोच की मदद नहीं ली और अपने घर पर ही समर्पण और कठिन परिश्रम के बल पर प्रशिक्षण प्राप्त किया। अपने आत्मविश्वास और बौद्धिक क्षमता से उन्होंने इस स्वर्णिम अध्याय को लिखा और भारतीय शतरंज के गौरव को और बढ़ाया।
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