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AIIMS National Seminar: हर मृत्यु हो दर्ज, प्रत्येक मृत्यु का कारण हो सुनिश्चित: एम्स में राष्ट्रीय संगोष्ठी, मृत्यु डेटा प्रणाली सुदृढ़ीकरण के लिए कंसोर्टियम का शुभारंभ

AIIMS National Seminar: हर मृत्यु हो दर्ज, प्रत्येक मृत्यु का कारण हो सुनिश्चित: एम्स में राष्ट्रीय संगोष्ठी, मृत्यु डेटा प्रणाली सुदृढ़ीकरण के लिए कंसोर्टियम का शुभारंभ

नई दिल्ली, 12 फरवरी। देश में होने वाली हर मृत्यु का पंजीकरण हो और प्रत्येक मृत्यु का कारण वैज्ञानिक तरीके से सुनिश्चित किया जाए, ताकि स्वास्थ्य नीतियां सटीक और विश्वसनीय आंकड़ों पर आधारित बन सकें—इसी उद्देश्य के साथ एम्स दिल्ली में मृत्यु सूचना प्रणाली सुदृढ़ीकरण पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ‘मृत्यु डेटा प्रणाली सुदृढ़ीकरण के लिए राष्ट्रीय कंसोर्टियम’ का शुभारंभ भी किया गया, जो देशभर में मृत्यु से संबंधित आंकड़ों की गुणवत्ता सुधारने और समन्वित अनुसंधान को बढ़ावा देने का कार्य करेगा।

संगोष्ठी का उद्घाटन नीति आयोग के सदस्य डॉ. विनोद के. पॉल ने किया। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए यह जरूरी है कि मौतों के वास्तविक कारणों की स्पष्ट और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध हो। यदि यह पता ही न हो कि लोग किन बीमारियों से अधिक मर रहे हैं, तो नीतियां और योजनाएं सटीक रूप से तैयार नहीं की जा सकतीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वसनीय मृत्यु आंकड़े जन स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोगों की पहचान करने में सहायक होंगे और संसाधनों के बेहतर उपयोग का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

कार्यक्रम का आयोजन पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (ऑस्ट्रेलिया), विश्व स्वास्थ्य संगठन (भारत), सीडीसी फाउंडेशन और वाइटल स्ट्रैटेजीज के सहयोग से किया गया। इस दौरान आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल, भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण और एम्स के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के डॉ. हर्षल साल्वे सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

डॉ. हर्षल साल्वे ने बताया कि भारत में अधिकांश मौतें स्वास्थ्य संस्थानों के बाहर होती हैं, जिसके कारण मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डेथ (एमसीसीडी) नहीं हो पाता। वर्तमान में केवल लगभग 8 प्रतिशत मौतों का ही चिकित्सकीय प्रमाणन हो पाता है, जबकि 92 प्रतिशत मौतों के कारणों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं होती। अधूरे आंकड़ों के आधार पर स्वास्थ्य नीतियां बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी कमी को दूर करने के लिए भारत के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय (ओआरजीआई) ने एम्स दिल्ली के सहयोग से ‘वर्बल ऑटोप्सी’ प्रणाली को लागू किया है।

वर्बल ऑटोप्सी विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी है जहां अधिकांश मौतें घर पर होती हैं और डॉक्टर द्वारा प्रमाणित मृत्यु-कारण उपलब्ध नहीं होता। इस पद्धति के माध्यम से स्वास्थ्यकर्मी मृतक के परिजनों से विस्तार से बातचीत कर मृत्यु से पूर्व के लक्षणों, बीमारी की अवधि और परिस्थितियों की जानकारी जुटाते हैं। बुखार, खांसी, सांस की तकलीफ, चोट, प्रसव संबंधी जटिलता या अन्य लक्षणों के आधार पर प्रशिक्षित चिकित्सक या कंप्यूटर एल्गोरिदम संभावित मृत्यु-कारण निर्धारित करते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, वर्बल ऑटोप्सी से प्राप्त आंकड़ों के जरिए यह स्पष्ट हो सकता है कि किसी क्षेत्र में हृदय रोग, टीबी, डेंगू, कुपोषण या अन्य बीमारियों से कितनी मौतें हो रही हैं। इससे स्वास्थ्य योजनाओं को लक्षित और प्रभावी बनाया जा सकेगा। राष्ट्रीय कंसोर्टियम का उद्देश्य विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाकर डेटा की गुणवत्ता में सुधार लाना और देश में मृत्यु पंजीकरण प्रणाली को अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाना है।

संगोष्ठी में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि “हर मृत्यु दर्ज हो और प्रत्येक मृत्यु का कारण सुनिश्चित हो” केवल एक नारा नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य सुधार की दिशा में एक अनिवार्य कदम है। विश्वसनीय और व्यापक मृत्यु आंकड़े ही भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों की मजबूत नींव बन सकते हैं।

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