Caste Certificate Dispute: जाति प्रमाणपत्र न बनने पर चार बच्चों के साथ चिता अनशन पर बैठा पिता, प्रशासन से न्याय की गुहार
नोएडा के जेवर क्षेत्र के कानीगढ़ी गांव में जाति प्रमाणपत्र नहीं बनने से नाराज एक व्यक्ति अपने चार बच्चों के साथ चिता अनशन पर बैठ गया। व्यक्ति का कहना है कि वह अपने बच्चों के अगरिया जाति के प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लंबे समय से सरकारी विभागों के चक्कर लगा रहा है, लेकिन अब तक प्रमाणपत्र नहीं बन सके हैं। गुरुवार को उसने शमशननगर-पूरननगर गांव में अपने चार बच्चों के साथ चिता अनशन शुरू किया और प्रशासन से मामले में हस्तक्षेप कर समाधान कराने की मांग की।
कानीगढ़ी गांव निवासी सुंदर सिंह का कहना है कि वह अगरिया जाति से संबंधित हैं और मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उनके चार बच्चे हैं। उनका दावा है कि बच्चों के जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए वह कई वर्षों से तहसील और अन्य सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं। उनके अनुसार, आवेदन की प्रक्रिया तहसील स्तर से पूरी होने के बाद मामला जिला मुख्यालय तक पहुंचा था।
सुंदर सिंह के मुताबिक, जिला मुख्यालय स्तर पर उनका आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया गया कि गौतमबुद्ध नगर जिले में अगरिया जाति के लोग निवास नहीं करते हैं। हालांकि सुंदर सिंह इस दावे से असहमत हैं। उनका कहना है कि उनके पिता, दादा और परिवार के अन्य पूर्वज लंबे समय से इसी क्षेत्र में रहते आए हैं और उनके पूर्वजों के अगरिया जाति के प्रमाणपत्र भी बने हुए हैं।
सुंदर सिंह का दावा है कि उन्होंने अपने पूर्वजों के जाति प्रमाणपत्रों की प्रतियां भी आवेदन के साथ संलग्न की थीं। इसके बावजूद बच्चों के प्रमाणपत्र जारी नहीं होने से वह परेशान हैं। उनका कहना है कि बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है।
गुरुवार को इसी मामले के विरोध में सुंदर सिंह अपने चार बच्चों के साथ शमशननगर-पूरननगर गांव में चिता अनशन पर बैठ गए। उन्होंने प्रशासन से उनकी शिकायत को गंभीरता से लेने और बच्चों के जाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी कराने की मांग की है।
सुंदर सिंह ने जिलाधिकारी मेधा रूपम पर भी मामले में अत्याचार करने का आरोप लगाया और न्याय की गुहार लगाई। हालांकि उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। जाति प्रमाणपत्र को लेकर प्रशासनिक स्तर पर आवेदन को किस आधार पर निरस्त किया गया और उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की क्या स्थिति है, यह संबंधित विभाग की जांच और रिकॉर्ड से स्पष्ट होगा।
अनशन के दौरान सुंदर सिंह ने भावुक होकर कहा कि वह आखिर कब तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी समस्या नहीं सुनी गई तो उनके सामने अपनी जान देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। उनके इस बयान के बाद मामले की संवेदनशीलता और बढ़ गई है।
परिवार की मांग है कि प्रशासन पूरे मामले की जांच कर उनके दस्तावेजों और पूर्वजों के प्रमाणपत्रों का परीक्षण करे तथा पात्रता के अनुसार बच्चों के जाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी की जाए। फिलहाल मामला प्रशासन के संज्ञान में है और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।


