Cancer Reporting: कैंसर के हर केस का होगा हिसाब, देश में बनेगा सटीक डेटा, 19 राज्यों में अनिवार्य रिपोर्टिंग पर विचार

Cancer Reporting: कैंसर के हर केस का होगा हिसाब, देश में बनेगा सटीक डेटा, 19 राज्यों में अनिवार्य रिपोर्टिंग पर विचार

नई दिल्ली, 18 अगस्त। देश में कैंसर के वास्तविक बोझ का सटीक आकलन करने और मरीजों के इलाज की बेहतर रणनीति तैयार करने की दिशा में बड़ा बदलाव हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कैंसर को ‘अधिसूचित बीमारी’ यानी नोटिफिएबल डिजीज की श्रेणी में शामिल करने पर विचार करने का निर्देश दिया है। यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो कैंसर का नया मामला सामने आने पर अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को संबंधित स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी देने की व्यवस्था करनी होगी।

इस पहल का उद्देश्य देश में कैंसर के मामलों का अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध रिकॉर्ड तैयार करना है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकेगी कि देश के किन हिस्सों में कैंसर का बोझ अधिक है, किस आयु वर्ग में बीमारी के मामले बढ़ रहे हैं और पुरुषों तथा महिलाओं में कैंसर के विभिन्न प्रकारों का प्रसार किस तरह हो रहा है।

देश में कुल 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं। इनमें से 17 में कैंसर को पहले ही अधिसूचित बीमारी बनाया जा चुका है। बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक समान अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था नहीं होने के कारण देश में कैंसर के वास्तविक मामलों का व्यापक और ताजा आकलन करना अब भी चुनौती बना हुआ है।

यह मामला एम्स के पूर्व ऑन्कोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनुराग श्रीवास्तव की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद कैंसर के मामलों की रिपोर्टिंग को देशभर में अधिक एकरूप बनाने की दिशा में चर्चा तेज हुई है।

दिल्ली राज्य कैंसर चिकित्सा संस्थान (डीएससीआई) के क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रज्ञा शुक्ला के अनुसार कैंसर की व्यवस्थित और समयबद्ध रिपोर्टिंग से बीमारी की वास्तविक स्थिति को समझने में काफी मदद मिलेगी। यदि हर नए मरीज का डेटा निर्धारित तरीके से दर्ज किया जाता है तो कैंसर के प्रकार, मरीज की उम्र, लिंग और क्षेत्रवार मामलों की अधिक सटीक तस्वीर सामने आ सकेगी।

इस तरह के आंकड़ों से केवल मरीजों की संख्या जानने में ही मदद नहीं मिलेगी, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की योजना बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। जिन क्षेत्रों में किसी खास प्रकार के कैंसर के मामले अधिक पाए जाते हैं, वहां स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को मजबूत किया जा सकता है। इसके अलावा शुरुआती जांच, डायग्नोस्टिक सुविधाओं, कैंसर उपचार केंद्रों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत का भी बेहतर आकलन किया जा सकेगा।

भारत में कैंसर के आंकड़े जुटाने का काम पहले से चल रहा है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम वर्ष 1981 से देश में कैंसर संबंधी आंकड़े एकत्र कर रहा है। हालांकि, हर मरीज का डेटा एक समान तरीके से और समय पर उपलब्ध होना अब भी चुनौती है। अलग-अलग स्वास्थ्य संस्थानों और क्षेत्रों से आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया में अंतर होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक तस्वीर तैयार करने में कठिनाई होती है।

यदि अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू होती है तो जिला स्तर तक कैंसर के नए मामलों का डेटा जोड़ना आसान हो सकता है। इससे ऐसे क्षेत्रों की पहचान भी बेहतर तरीके से की जा सकेगी जहां कैंसर का बोझ राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक है। इसके आधार पर सरकार वहां स्क्रीनिंग, जागरूकता, जांच और उपचार सुविधाओं को प्राथमिकता के आधार पर बढ़ा सकती है।

कैंसर को अधिसूचित बीमारी बनाने का उद्देश्य संक्रमण रोकना नहीं है। कैंसर संक्रामक बीमारी नहीं है। इसका मकसद बीमारी के वास्तविक बोझ और उसके पैटर्न को समझना है, ताकि स्वास्थ्य नीतियां और सरकारी संसाधनों की योजना ज्यादा सटीक आंकड़ों के आधार पर तैयार की जा सके।

हालांकि, इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देना होगा। निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों की भागीदारी सुनिश्चित करना, रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को आसान बनाना, डिजिटल माध्यम से डेटा दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध कराना और आंकड़ों की गुणवत्ता बनाए रखना जरूरी होगा। इसके साथ ही मरीजों की व्यक्तिगत और चिकित्सकीय जानकारी की गोपनीयता की भी पर्याप्त सुरक्षा करनी होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि देश में कैंसर के हर नए मामले की नियमित और गुणवत्तापूर्ण रिपोर्टिंग सुनिश्चित होती है तो भविष्य में कैंसर नियंत्रण की रणनीति को अधिक सटीक बनाया जा सकेगा। इससे बीमारी की पहचान से लेकर स्क्रीनिंग, शुरुआती जांच, उपचार और स्वास्थ्य संसाधनों के वितरण तक हर स्तर पर बेहतर योजना तैयार करने में मदद मिल सकती है।

ऐसी स्थिति में कैंसर का प्रत्येक नया मामला केवल एक मरीज का चिकित्सकीय रिकॉर्ड नहीं रहेगा, बल्कि देश में कैंसर के बदलते स्वरूप को समझने और भविष्य की स्वास्थ्य नीति तय करने वाला महत्वपूर्ण डेटा बन सकेगा।

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