Himachal Pradesh Law University: न्याय का उद्देश्य कमजोर वर्गों तक न्याय पहुंचाना, बोले मुख्यमंत्री सुक्खू; एनएलयू शिमला के दीक्षांत समारोह में मेधावी छात्र सम्मानित
शिमला। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों तक न्याय सुनिश्चित करना, जरूरतमंदों की आवाज सुनना और प्रत्येक नागरिक को उसके अधिकारों की सुरक्षा का भरोसा देना है। लोकतंत्र में न्याय केवल न्यायिक आदेशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निष्पक्षता, विवेकशीलता और हर मामले की परिस्थितियों को समझना भी आवश्यक है। मुख्यमंत्री रविवार को हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू), शिमला के तीसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया।
मुख्यमंत्री ने स्नातक विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि उन्हें दृढ़ संकल्प, ईमानदारी और निरंतर प्रयासों के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करना चाहिए। उनके अनुसार, विद्यार्थियों की सफलता का मूल्यांकन केवल उनकी व्यावसायिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान से भी किया जाना चाहिए। उन्होंने विधि स्नातकों से अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए करने का आह्वान किया।
अपने शैक्षणिक जीवन का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से विधि की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिक रुचि राजनीति में रही, लेकिन विधि की शिक्षा उनके राजनीतिक जीवन में भी उपयोगी साबित हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि कानून की समझ शासन व्यवस्था, नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक दायित्वों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि प्रदेश सरकार आम नागरिकों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने के लिए न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने न्यायपालिका को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि संविधान के तीनों अंगों का मूल उद्देश्य नागरिकों की सेवा करना और उनके अधिकारों तथा न्याय की रक्षा सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि देश के नागरिकों का संविधान और न्याय व्यवस्था में गहरा विश्वास है, इसलिए सभी संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने दायित्वों का निर्वहन संवैधानिक भावना के अनुरूप करें।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने न्यायिक निर्णयों और राज्य सरकार की वित्तीय जिम्मेदारियों से जुड़े कुछ मामलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जनहित में शुरू की गई योजनाओं और सरकारी पहलों के क्रियान्वयन के दौरान कुछ न्यायिक निर्णयों से व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसार, कुछ मामलों में भर्ती नियमों में स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के बावजूद वित्तीय लाभ देने के निर्देश दिए गए, जिससे राज्य के राजकोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।
मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2003 में सरकार ने अनुबंध कर्मचारियों को वरिष्ठता और वेतन वृद्धि का लाभ नहीं देने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा कि लगभग दो दशक बाद न्यायालय ने भर्ती नियमों में ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के बावजूद वित्तीय लाभ देने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री के अनुसार, कोई भी निर्वाचित सरकार अपने कर्मचारियों को उनके देय वित्तीय लाभों से वंचित नहीं रखना चाहती, लेकिन राज्य को अपने सीमित वित्तीय संसाधनों और राजकोषीय दायित्वों का भी ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जनहित, नियमों और राज्य की वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन बनाए रखना शासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां खेल मैदानों के निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए स्कूलों और सामुदायिक खेल मैदानों के साझा उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने पहली बार स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन के लिए पांच लाख रुपये की राशि का भुगतान किया। मुख्यमंत्री के अनुसार, उच्च न्यायालय ने एक सरकारी स्कूल के खेल मैदान के उपयोग की अनुमति इस शर्त पर दी थी कि निर्धारित राशि का भुगतान किया जाए।
मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला में आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार की ओर से हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों, विद्यार्थियों और सरकार के सामूहिक प्रयासों से एनएलयू शिमला को शिक्षा, विधि अनुसंधान और अकादमिक उत्कृष्टता के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जाएगा।
समारोह में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता का उल्लेख करते हुए इसे धरती पर स्वर्ग के समान बताया। उन्होंने कहा कि समाज में विधि स्नातकों की भूमिका विशिष्ट है और उनका दायित्व केवल कानून की व्याख्या करने तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कानून के विद्यार्थी समाज में बदलाव लाने वाले सामाजिक अभियंता, सामाजिक चिकित्सक और सामाजिक संरचनाकार की भूमिका निभाते हैं।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि कानून और न्याय के प्रति सम्मान केवल कानूनी प्रावधानों की सैद्धांतिक समझ तक सीमित नहीं होना चाहिए। न्याय की प्रभावी व्यवस्था के लिए गहन ज्ञान, न्याय की भावना और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों को बदलती परिस्थितियों और नई चुनौतियों के लिए तैयार रहने की सलाह दी।
उन्होंने विशेष रूप से कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले समय में इसका समाज और कानूनी पेशे पर ठोस असर पड़ेगा। ऐसे में विधि विद्यार्थियों को नई तकनीकों के बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए, तकनीकी बदलावों को अपनाना चाहिए और अपने ज्ञान तथा कौशल को लगातार बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सीखने की निरंतर प्रक्रिया ही विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर सकती है।
दीक्षांत समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ने शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया ने स्नातक विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान कीं। इस अवसर पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, त्रिपुरा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एस. रामचंद्र राव और झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान को डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला की कुलपति डॉ. प्रीति सक्सेना, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। समारोह में न्याय, संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और बदलती तकनीक के अनुरूप विधि शिक्षा को विकसित करने के महत्व पर जोर दिया गया।


