Kidney Transplant: देश में 61 हजार से ज्यादा मरीज किडनी ट्रांसप्लांट के इंतजार में, मांग और उपलब्धता के बीच करीब पांच गुना अंतर
नई दिल्ली। देश में किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए प्रत्यारोपण का इंतजार बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उपलब्ध अंगों और प्रत्यारोपण सुविधाओं की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ पा रही है। संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 9 फरवरी तक देश में 61,668 मरीज किडनी ट्रांसप्लांट के इंतजार में थे, जबकि पूरे वर्ष 2024 में केवल 13,476 किडनी ट्रांसप्लांट किए गए। ये आंकड़े मांग और उपलब्धता के बीच करीब पांच गुना अंतर की ओर इशारा करते हैं।
समिति ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए देश में अंगदान को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि किडनी ट्रांसप्लांट के मामले में भारत अभी भी मुख्य रूप से जीवित अंगदाताओं पर निर्भर है। वर्ष 2024 में हुए कुल किडनी ट्रांसप्लांट में 11,558 किडनी जीवित दाताओं से मिलीं, जबकि मृतक दाताओं से केवल 1,918 किडनी प्रत्यारोपित की गईं।
मृतक अंगदान की कम संख्या के कारण जरूरत और उपलब्धता के बीच का अंतर कम करना मुश्किल हो रहा है। समिति ने लोगों के बीच अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाने की सिफारिश की है। इसके साथ ही अस्पतालों में अंग प्राप्ति और प्रत्यारोपण से जुड़े समन्वय तंत्र को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।
देश में ट्रांसप्लांट सुविधाओं के असमान वितरण को भी बड़ी समस्या बताया गया है। किडनी प्रत्यारोपण की अधिकांश सुविधाएं दिल्ली, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे चुनिंदा राज्यों में केंद्रित हैं। इससे उन राज्यों के मरीजों के लिए परेशानी बढ़ जाती है, जहां पर्याप्त ट्रांसप्लांट सेंटर और विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं।
समिति ने सिफारिश की है कि देश के सभी राज्यों में अंग प्रत्यारोपण की सुविधाओं का विस्तार किया जाए, ताकि मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नेफ्रोलॉजी विभाग स्थापित करने और विशेषज्ञ डॉक्टरों के रिक्त पदों को भरने की आवश्यकता भी बताई गई है।
रिपोर्ट में अंगदान से जुड़ी लैंगिक असमानता पर भी ध्यान आकर्षित किया गया है। आंकड़ों के मुताबिक जीवित अंगदाताओं में करीब 63.8 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि अंग प्रत्यारोपण प्राप्त करने वालों में लगभग 69.8 प्रतिशत पुरुष हैं। समिति ने इस अंतर के सामाजिक, आर्थिक और अन्य संभावित कारणों का अध्ययन करने की जरूरत बताई है।
देश में क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों की वास्तविक स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए राष्ट्रीय रीनल रजिस्ट्री तैयार करने की सिफारिश भी की गई है। इससे मरीजों, बीमारी के कारणों, डायलिसिस और प्रत्यारोपण से जुड़े आंकड़ों को व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने में मदद मिल सकती है।
समिति ने किडनी की बीमारी के इलाज पर होने वाले भारी खर्च को कम करने के उपाय करने की भी सिफारिश की है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर उच्च जोखिम वाले लोगों की नियमित जांच बढ़ाने और जरूरतमंद मरीजों के लिए होम-बेस्ड पेरिटोनियल डायलिसिस को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है।
एम्स दिल्ली के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप महाजन के अनुसार किडनी फेल होने के प्रमुख कारणों में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर शामिल हैं। लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर और रक्तचाप किडनी की महीन रक्त वाहिकाओं और ग्लोमेरुलस को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
इसके अलावा पेनकिलर दवाओं का अनुचित या अत्यधिक इस्तेमाल, मोटापा, अधिक नमक वाला आहार, बार-बार यूरिन इंफेक्शन और किडनी स्टोन जैसी समस्याएं भी लंबे समय में किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जोखिम वाले लोगों में बीमारी की समय रहते पहचान होने से गंभीर स्थिति तक पहुंचने की आशंका को कम किया जा सकता है।
भारत में हर साल लगभग 13 से 14 हजार किडनी ट्रांसप्लांट किए जाते हैं, जबकि अनुमान के मुताबिक हर साल करीब दो लाख नए एंड-स्टेज किडनी डिजीज के मरीज सामने आते हैं। ऐसे में ट्रांसप्लांट की जरूरत और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
देशभर में करीब 600 किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर होने का अनुमान है, लेकिन इनमें सरकारी क्षेत्र के केंद्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम बताई गई है। बड़ी संख्या में ट्रांसप्लांट सुविधाएं निजी क्षेत्र में होने के कारण आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए इलाज तक पहुंच भी चुनौती बन सकती है।
संसदीय समिति ने स्पष्ट किया है कि केवल ट्रांसप्लांट सेंटर बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। मृतक अंगदान को बढ़ावा देने, अस्पतालों में मजबूत समन्वय व्यवस्था बनाने, विशेषज्ञों की उपलब्धता बढ़ाने और किडनी रोग की शुरुआती पहचान पर एक साथ काम करने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लंबे इंतजार और मांग-आपूर्ति के बीच मौजूद बड़ी खाई को कम किया जा सकेगा।


