Liver Transplant: मामा ने दिया ‘जिगर’ का टुकड़ा, बची पांच माह की भांजी की जान; रक्षाबंधन से पहले रिश्ते की भावुक मिसाल
नई दिल्ली। रक्षाबंधन से पहले भाई-बहन के रिश्ते और परिवार के निस्वार्थ प्रेम की एक भावुक मिसाल सामने आई है। 24 वर्षीय शिवेंद्र कुमार पांडेय ने गंभीर लिवर फेलियर से जूझ रही अपनी महज पांच माह की भांजी सांविका शुक्ला की जान बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान कर दिया। फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग में बच्ची का जटिल लिवर ट्रांसप्लांट सफल रहा और सर्जरी के करीब 20 दिन बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
अस्पताल के मुताबिक सांविका को जन्म के कुछ सप्ताह बाद ही पीलिया की समस्या होने लगी थी। शुरुआती उपचार के बावजूद उसकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। विस्तृत जांच में पित्त नली में अवरोध के कारण लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचने की स्थिति सामने आई।
समय के साथ बच्ची की हालत बिगड़ती गई और लिवर फेलियर की स्थिति बन गई। डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इतनी कम उम्र की बच्ची के लिए इलाज के विकल्प बेहद सीमित थे। मेडिकल टीम ने स्थिति का आकलन करने के बाद तत्काल लिवर ट्रांसप्लांट को उसकी जान बचाने का जरूरी विकल्प बताया।
इसके बाद परिवार में उपयुक्त लिवर डोनर की तलाश शुरू हुई। बच्ची के माता-पिता और दादी की भी जांच की गई, लेकिन उन्हें अंगदान के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। ऐसे मुश्किल समय में सांविका के 24 वर्षीय मामा शिवेंद्र कुमार पांडेय अपनी भांजी के लिए आगे आए।
जरूरी मेडिकल जांच और प्रक्रिया पूरी होने के बाद शिवेंद्र को लिवर डोनेशन के लिए उपयुक्त पाया गया। उन्होंने अपनी पांच महीने की भांजी की जिंदगी बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान करने का फैसला किया।
फोर्टिस अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. आशीष जॉर्ज के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने जटिल पीडियाट्रिक लिवर ट्रांसप्लांट किया। पांच माह के शिशु का ट्रांसप्लांट सामान्य लिवर ट्रांसप्लांट की तुलना में तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था।
डॉक्टरों के मुताबिक इतनी कम उम्र के बच्चे की रक्त वाहिनियां बहुत छोटी होती हैं। ऐसे में नए लिवर के हिस्से को शरीर की रक्त वाहिनियों से सफलतापूर्वक जोड़ना अत्यधिक सावधानी और तकनीकी विशेषज्ञता की मांग करता है।
ऑपरेशन के दौरान एक सुरक्षित संरक्षित कैडेवरिक डोनर की रक्त वाहिनी का इस्तेमाल भी किया गया। इसकी मदद से जटिल ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को पूरा किया गया। सर्जरी सफल रहने के बाद बच्ची को लगातार डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया।
ट्रांसप्लांट के बाद सांविका की स्थिति में सुधार हुआ और करीब 20 दिन तक अस्पताल में निगरानी और उपचार के बाद उसे छुट्टी दे दी गई। बच्ची की सफल सर्जरी से परिवार को बड़ी राहत मिली है।
रक्षाबंधन से ठीक पहले सामने आई यह कहानी भाई-बहन और उनके परिवारों के बीच निस्वार्थ रिश्ते की एक अलग मिसाल बन गई है। एक मामा द्वारा अपनी पांच माह की भांजी के लिए लिवर का हिस्सा दान करने के फैसले ने अंगदान के महत्व को भी रेखांकित किया है।


