Global Debt Risk: RBI गवर्नर ने बढ़ते वैश्विक कर्ज और AI-साइबर जोखिमों को बताया वित्तीय स्थिरता के लिए चुनौती
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक वित्तीय स्थिरता से जुड़े कई उभरते जोखिमों पर चिंता जताई है। नई दिल्ली में पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में उन्होंने बढ़ते वैश्विक कर्ज, ऊंचे एसेट वैल्यूएशन, अधिक लीवरेज, प्राइवेट क्रेडिट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े साइबर जोखिमों को प्रमुख चुनौतियों में गिनाया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग जोखिम सीमित असर डाल सकते हैं, लेकिन कई जोखिम एक साथ उभरें तो दबाव बढ़ सकता है।
मल्होत्रा के मुताबिक ग्लोबल डेट-टू-जीडीपी अनुपात में बढ़ोतरी, कर्ज की कम होती परिपक्वता अवधि और सरकारी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि वित्तीय स्थिति को कठिन बना सकती है। ऊंची उधारी लागत से सरकारों की वित्तीय गुंजाइश प्रभावित हो सकती है, जबकि कंपनियों के लिए कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने AI से जुड़े निवेश और परिसंपत्ति मूल्यांकन को भी एक महत्वपूर्ण जोखिम बताया। मल्होत्रा ने कहा कि AI क्षेत्र में निवेश ने हाल के वर्षों में वित्तीय बाजारों को समर्थन दिया है, लेकिन निवेश या कमाई की रफ्तार में कमी आने पर संबंधित कंपनियों और पूरी वैल्यू चेन के मूल्यांकन में तेज बदलाव संभव है। इससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
बढ़ते लीवरेज का जिक्र करते हुए RBI गवर्नर ने हेज फंड, ऑप्शन सेलर्स, ETF और दूसरे गैर-बैंक वित्तीय संस्थानों की गतिविधियों का उल्लेख किया। उनके अनुसार ऊंचे बाजार मूल्यांकन और बैंकिंग व गैर-बैंकिंग संस्थानों के बढ़ते आपसी जुड़ाव के बीच वित्तीय परिस्थितियों में अचानक सख्ती का असर कई बाजारों तक फैल सकता है।
प्राइवेट क्रेडिट को उन्होंने एक उभरते जोखिम के रूप में रेखांकित किया और कुछ हाई-प्रोफाइल डिफॉल्ट मामलों का उल्लेख किया। उनके अनुसार ऐसी घटनाएं इस क्षेत्र में लेंडिंग मानकों पर सवाल खड़े कर सकती हैं और यह जोखिम खासकर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
AI के विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे भी उनके संबोधन का अहम हिस्सा रहे। उन्होंने मॉडल जोखिम, थर्ड-पार्टी पर निर्भरता तथा मानवीय निगरानी और जवाबदेही में संभावित कमी को महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल किया। वैश्विक वित्तीय संस्थानों के आपस में जुड़े होने के कारण किसी एक हिस्से की साइबर कमजोरी का प्रभाव दूसरे देशों तक पहुंच सकता है।
मल्होत्रा ने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष जैसी वैश्विक घटनाएं महंगाई और वित्तीय कमजोरियों पर असर डाल सकती हैं। भारत भी एक बड़ी खुली अर्थव्यवस्था होने के कारण कमोडिटी कीमतों और बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है। हालांकि, उन्होंने भारत की मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति और वित्तीय प्रणाली को इन चुनौतियों से निपटने में सहायक बताया।
RBI गवर्नर ने कहा कि भारतीय बैंक और गैर-बैंक वित्तीय संस्थान मजबूत बैलेंस शीट के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने RBI की जून 2026 Financial Stability Report के स्ट्रेस टेस्ट का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बैंकों की पूंजी स्थिति आरामदायक बनी हुई है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा मजबूती को भविष्य के हर जोखिम से सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता।
उन्होंने वित्तीय स्थिरता की निगरानी लगातार बनाए रखने और अलग-अलग जोखिमों के बीच संबंधों को समझने पर जोर दिया। उनके मुताबिक भविष्य में वित्तीय व्यवधान की शुरुआत केवल किसी बैंक या वित्तीय संस्था से ही हो, यह जरूरी नहीं; भू-राजनीतिक घटना, साइबर हमला या तकनीकी विफलता भी असर डाल सकती है।
भारत की मजबूती बनाए रखने के लिए मल्होत्रा ने ऊर्जा और अन्य जरूरी संसाधनों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने, आयात स्रोतों को विविध बनाने, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मजबूत करने, ऊर्जा बदलाव को तेज करने, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और वैश्विक वैल्यू चेन में देश की भागीदारी गहरी करने जैसे उपायों का उल्लेख किया।


