Diwali Travel Rush: घर पहुंचने की जल्दबाजी में बसों की छत पर बैठकर सफर कर रहे यात्री, पूर्वी दिल्ली की तस्वीरों ने उठाए सुरक्षा पर सवाल
पूर्वी दिल्ली। दीपावली के मौके पर अपनों के बीच पहुंचने के लिए दिल्ली से घर लौट रहे यात्रियों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है। प्रवासी मजदूर हों या दूसरे यात्री, सभी त्योहार से पहले अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी में हैं। इसी दौरान पूर्वी दिल्ली से कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें कई यात्री निजी बसों की छत पर बैठकर यात्रा करते नजर आ रहे हैं। बसों में भीतर जगह न मिलने के कारण बनी इस स्थिति ने यात्रियों की सुरक्षा के साथ-साथ बसों की निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सामने आई तस्वीरों में निजी बसों की छत पर यात्री बैठे साफ दिखाई देते हैं। बस सड़क पर दौड़ रही होती है, फिर भी वे ऊपर ही बैठे रहते हैं। मिली जानकारी के अनुसार, यात्री कई किलोमीटर तक इसी हालत में सफर करते देखे गए। त्योहार पर घर पहुंचने की बेसब्री में किया जा रहा यह खतरनाक सफर कभी भी किसी हादसे की वजह बन सकता है।
दिल्ली में रोजी-रोटी कमाने वाले बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर दीपावली पर अपने परिवार के पास जाते हैं। जैसे-जैसे त्योहार करीब आता है, यात्रियों की तादाद बढ़ती है और मौजूद वाहनों में जगह पाने की होड़ भी तेज हो जाती है। फिर भी बस के अंदर सीट या खड़े होने तक की जगह न मिलने पर छत पर बैठकर सफर करना सुरक्षित रास्ता नहीं है। घर पहुंचना जितना जरूरी है, रास्ते में अपनी जान की हिफाजत भी उतनी ही अहम है।
चलती बस की छत पर बैठे लोगों के लिए अचानक ब्रेक लगने या गाड़ी के तेजी से मुड़ने पर नीचे गिरने का खतरा बना रहता है। किसी ऊंचे ढांचे के नीचे से गुजरते वक्त भी हादसा होने की आशंका रहती है। बस के भीतर यात्रियों के लिए तय जगह जैसी सुरक्षा छत पर बैठने वालों को ऐसे खतरों से नहीं मिल पाती। ऐसी हालत में जरा-सी चूक भी गंभीर नतीजे दे सकती है।
निजी बसों में क्षमता से ज्यादा सवारियां बैठाने और छत पर यात्रा की अनुमति देने के आरोप भी लग रहे हैं। जब यात्रियों की संख्या बढ़ती है, तब बस संचालकों और चालक-परिचालकों पर जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उनका दायित्व है कि गाड़ी में सवार हर व्यक्ति को सुरक्षित ढंग से उसके गंतव्य तक ले जाया जाए। अंदर जगह न होने पर भी यात्रियों को छत पर बैठाकर बस आगे बढ़ा देना सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को और गहरा करता है।
इन तस्वीरों के बाद बस संचालकों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यात्रियों को छत पर चढ़ने और वहीं बैठकर सफर करने की नौबत आखिर क्यों आने दी गई? बस रवाना करने से पहले उसमें सवार लोगों की स्थिति क्यों नहीं देखी गई? जो लोग यात्रियों को घर पहुंचाने का जिम्मा लेते हैं, उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि वे सफर को सुरक्षित बनाने की व्यवस्था करें।
सड़कों पर इस हालत में दौड़ती बसें निगरानी तंत्र पर भी सवालिया निशान लगाती हैं। अगर यात्री कई किलोमीटर तक छत पर बैठकर सफर करते दिख रहे हैं, तो उन रास्तों पर जांच और निगरानी कितनी कारगर है? त्योहार के दौरान उमड़ी भीड़ को देखते हुए बसों की हालत और उनमें सवार यात्रियों की सुरक्षा पर खास ध्यान देने की जरूरत साफ दिखाई देती है।
भीड़ के दिनों में सिर्फ वाहनों का चलते रहना ही काफी नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि बसें यात्रियों को किस हालत में ले जा रही हैं। बसों की जांच करते समय सवारियों की संख्या, उनके बैठने का इंतजाम और छत पर किसी की मौजूदगी जैसी बातों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
यात्रियों की मजबूरी समझते हुए उन्हें सुरक्षित सफर का विकल्प देना भी उतना ही जरूरी है। त्योहार पर जब मांग बढ़ जाती है और परिवहन के साधन उसके मुकाबले कम पड़ते हैं, तो लोग जोखिम वाले रास्ते चुनने लगते हैं। ऐसे हालात में सुरक्षित परिवहन मुहैया कराने और यात्रियों तक सही जानकारी पहुंचाने की जरूरत और बढ़ जाती है।
पूर्वी दिल्ली की ये तस्वीरें बताती हैं कि किसी हादसे के होने का इंतजार किए बिना इस समस्या पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यात्रियों को खतरनाक ढंग से सफर करने से बचाना बस संचालकों, चालक-परिचालकों और निगरानी से जुड़े विभागों की जिम्मेदारी है। साथ ही यात्रियों को भी बस की छत पर बैठने जैसा जोखिम उठाने से बचना चाहिए।
दीपावली पर अपनों से मिलने की खुशी तभी पूरी होती है, जब इंसान सुरक्षित घर पहुंचे। त्योहार की हड़बड़ी में सफर का जोखिम बढ़ने से किसी परिवार की खुशियों पर असर पड़ सकता है। इन तस्वीरों से साफ है कि बढ़ती भीड़ के बीच बसों की कारगर जांच, यात्रियों के लिए सुरक्षित इंतजाम और जिम्मेदारी भरे संचालन की जरूरत है।





