Defence Production: 3,500 करोड़ की परियोजनाओं से बढ़ेगी भारत की समुद्री ताकत, युद्धपोत निर्माण और रक्षा उत्पादन को मिलेगी रफ्तार
नई दिल्ली/कोलकाता। भारत को वैश्विक शिपबिल्डिंग और जहाज मरम्मत केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में रक्षा क्षेत्र में करीब 3,500 करोड़ रुपये की पांच विस्तार परियोजनाओं का वर्चुअल भूमिपूजन किया गया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इनमें गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) की तीन और यंत्र इंडिया लिमिटेड (वाईआईएल) की दो परियोजनाएं शामिल हैं। इन परियोजनाओं के पूरा होने से युद्धपोत निर्माण, जहाजों की मरम्मत, फोर्जिंग और रक्षा उपकरणों के स्वदेशी उत्पादन की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस अवसर पर आत्मनिर्भरता को देश की सुरक्षा और सैन्य क्षमता से सीधे जुड़ा विषय बताया। उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल एक सरकारी नीति नहीं है, बल्कि युद्धक्षेत्र में देश की ताकत बढ़ाने वाले ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की तरह काम करती है। आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में स्वदेशी हथियारों, उपकरणों और प्लेटफॉर्म की उपलब्धता रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इसने स्वदेशी हथियार प्रणालियों और रक्षा प्लेटफॉर्म की अहमियत को सामने रखा है। रक्षा उत्पादन में देश की अपनी क्षमता मजबूत होने से जरूरत के समय विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम होती है और सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं को तेजी से पूरा किया जा सकता है।
जीआरएसई की विस्तार परियोजनाओं में रायचक परियोजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां विकसित होने वाली नई सुविधाओं के जरिए 200 मीटर तक लंबे युद्धपोतों के निर्माण की क्षमता तैयार की जाएगी। इससे बड़े और आधुनिक युद्धपोतों के निर्माण में देश की क्षमता बढ़ने के साथ भारतीय नौसेना की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
इन परियोजनाओं का प्रभाव केवल नए युद्धपोतों के निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा। जहाजों की मरम्मत और रखरखाव से जुड़ी सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे रक्षा क्षेत्र के साथ व्यावसायिक जहाज निर्माण और मरम्मत उद्योग को भी फायदा मिल सकता है।
यंत्र इंडिया लिमिटेड की दो परियोजनाओं के जरिए रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण फोर्जिंग क्षमता का विस्तार किया जाएगा। नई फोर्जिंग इकाइयों में तोपों की नाल, गोला-बारूद, नौसैनिक हथियार प्रणालियों और परमाणु क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण कलपुर्जों के उत्पादन की क्षमता विकसित की जाएगी। इससे रक्षा उत्पादन की आपूर्ति श्रृंखला में स्वदेशीकरण को और बढ़ावा मिलेगा।
रक्षा मंत्री ने वैश्विक शिपबिल्डिंग उद्योग में उभर रहे ‘कैपेसिटी पैराडॉक्स’ की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने इसे भारत के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखते हुए कहा कि दुनिया में जहाज निर्माण की बढ़ती जरूरतों के बीच भारत अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर वैश्विक बाजार में मजबूत हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत के पास आधुनिक तकनीक, कुशल मानव संसाधन और मजबूत एमएसएमई नेटवर्क मौजूद है। इन क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करते हुए देश को दुनिया के प्रमुख शिपबिल्डिंग और शिप रिपेयर केंद्रों में शामिल करने की दिशा में काम किया जाना चाहिए।
करीब 3,500 करोड़ रुपये की इन पांच परियोजनाओं से बड़े रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों के साथ उनसे जुड़े एमएसएमई और सहायक उद्योगों के लिए भी नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़ने से रक्षा उपकरणों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और देश में तकनीकी विशेषज्ञता तथा रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिल सकता है।
सरकार का जोर रक्षा उत्पादन में आयात पर निर्भरता कम करते हुए डिजाइन, निर्माण, मरम्मत और महत्वपूर्ण कलपुर्जों के उत्पादन की पूरी क्षमता देश के भीतर विकसित करने पर है। जीआरएसई और यंत्र इंडिया की नई परियोजनाओं को इसी दिशा में रक्षा और समुद्री औद्योगिक क्षमता बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।


