CKM Syndrome: 23 की उम्र में ही दिल-किडनी पर खतरा, अमेरिकी शोध में 80% युवा जोखिम की चपेट में
नई दिल्ली। दिल और किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों को अक्सर बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता है, लेकिन एक नए अमेरिकी अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन में औसतन 23 वर्ष की उम्र वाले युवाओं में करीब 80 प्रतिशत को कार्डियोवैस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक (सीकेएम) सिंड्रोम के स्टेज-1 से 3 में पाया गया। कई युवाओं की प्रमुख धमनियों में शुरुआती बदलाव के संकेत भी मिले, जिससे कम उम्र से ही दिल, किडनी और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत सामने आई है।
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के जर्नल ‘सर्कुलेशन: कार्डियोवैस्कुलर क्वालिटी एंड आउटकम्स’ में प्रकाशित अध्ययन में 1,283 युवाओं के स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में शामिल युवाओं की औसत उम्र करीब 23 वर्ष थी।
शोध के मुताबिक करीब 21 प्रतिशत प्रतिभागी सीकेएम सिंड्रोम के स्टेज-0 में थे, जिसे अपेक्षाकृत बेहतर स्वास्थ्य स्थिति माना जाता है। बाकी बड़ी संख्या में युवा स्टेज-1 से स्टेज-3 के बीच पाए गए। अध्ययन में किसी भी प्रतिभागी को स्टेज-4 में नहीं पाया गया।
सीकेएम सिंड्रोम दिल, किडनी और शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को दर्शाता है। मोटापा, बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर में गड़बड़ी, कोलेस्ट्रॉल और किडनी से जुड़े जोखिम एक-दूसरे को प्रभावित कर भविष्य में गंभीर हृदय रोगों की आशंका बढ़ा सकते हैं।
अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने कैरोटिड आर्टरी के अल्ट्रासाउंड के जरिए प्रतिभागियों की धमनियों की स्थिति का भी आकलन किया। अधिक सीकेएम स्टेज वाले युवाओं में धमनी की दीवार अपेक्षाकृत अधिक मोटी पाई गई। इसे एथेरोस्क्लेरोसिस यानी धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया से जुड़े शुरुआती संकेतों में माना जाता है।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआत में व्यक्ति को किसी तरह की स्पष्ट परेशानी महसूस नहीं हो सकती। बाहर से स्वस्थ दिखाई देने वाले युवा भी मोटापा, खराब खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता, बढ़े हुए ब्लड प्रेशर या ब्लड शुगर जैसी समस्याओं के कारण भविष्य के स्वास्थ्य जोखिम की ओर बढ़ सकते हैं।
मेटाबॉलिक सिंड्रोम ऐसी स्थिति को कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति में पेट के आसपास अधिक चर्बी, बढ़ी ब्लड शुगर, हाई ब्लड प्रेशर और असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसे कई जोखिम एक साथ मौजूद होते हैं। लंबे समय तक इन पर नियंत्रण नहीं होने पर हृदय रोग और टाइप-2 डायबिटीज जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि हृदय रोग से बचाव के प्रयास 30 या 40 वर्ष की उम्र तक टालने के बजाय किशोरावस्था और युवावस्था से ही शुरू किए जाने चाहिए। नियमित स्वास्थ्य जांच के साथ खान-पान और जीवनशैली पर ध्यान देना भविष्य के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
शोधकर्ताओं ने अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के ‘लाइफ्स एसेंशियल 8’ पर विशेष जोर दिया है। इसमें पौष्टिक भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, तंबाकू और निकोटीन से दूरी, पर्याप्त नींद, स्वस्थ वजन तथा ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना शामिल है।
विशेषज्ञों के मुताबिक कम उम्र से इन स्वास्थ्य मानकों पर ध्यान देना लंबे समय में दिल, किडनी और मेटाबॉलिक बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। अध्ययन का संदेश यह भी है कि युवा उम्र को बेहतर हृदय स्वास्थ्य की गारंटी मानने के बजाय स्वस्थ जीवनशैली को जल्द से जल्द अपनाना जरूरी है।





