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POCSO Case: पॉक्सो और दुष्कर्म मामले में आरोपी बरी, अदालत में पीड़िता समेत तीन प्रमुख गवाह अपने बयान से पलटे

POCSO Case: पॉक्सो और दुष्कर्म मामले में आरोपी बरी, अदालत में पीड़िता समेत तीन प्रमुख गवाह अपने बयान से पलटे

नोएडा की विशेष पॉक्सो अदालत ने करीब चार वर्ष पुराने दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक मामले में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। सुनवाई के दौरान नाबालिग पीड़िता, उसके पिता और मां तीनों ही अदालत में अपने पहले दिए गए बयानों से मुकर गए, जिसके बाद अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर पड़ गया और आरोपी को राहत मिल गई।

यह मामला वर्ष 2022 में सूरजपुर थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था। शिकायत के अनुसार 5 फरवरी 2022 को 13 वर्षीय किशोरी घर में अकेली थी। आरोप था कि शौच के लिए जंगल जाने के दौरान पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने उसके साथ दुष्कर्म किया। शिकायत में यह भी कहा गया था कि आरोपी ने कथित रूप से घटना के दौरान अश्लील फोटो और वीडियो भी बनाए थे।

परिवार के अनुसार घटना के बाद किशोरी घर पहुंची और उसने अपनी मां को पूरी जानकारी दी। इसके बाद पीड़िता के पिता ने 7 फरवरी 2022 को सूरजपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं और पॉक्सो एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की तथा जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी।

मामले की सुनवाई विशेष पॉक्सो अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब नाबालिग पीड़िता ने अदालत में अपने पहले दिए गए आरोपों का समर्थन नहीं किया। अदालत में दिए गए बयान में उसने कहा कि आरोपी ने उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया और न ही उसकी कोई अश्लील फोटो या वीडियो बनाई गई थी।

इसके बाद पीड़िता के माता-पिता ने भी अदालत में अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन करने से इनकार कर दिया। दोनों ने भी अपने पहले दिए गए बयानों से अलग बयान दर्ज कराया। तीनों प्रमुख गवाहों के अपने पूर्व बयान से मुकर जाने के कारण अदालत ने उन्हें होस्टाइल घोषित कर दिया।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि आरोपी और पीड़िता के परिवार के बीच पहले से हैंडपंप की मरम्मत और पैसों के लेनदेन को लेकर विवाद चल रहा था। अदालत ने इस तथ्य को भी रिकॉर्ड पर लिया, हालांकि अंतिम निर्णय का आधार मुख्य रूप से गवाहों के अदालत में दिए गए बयान और उपलब्ध साक्ष्य रहे।

विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक होता है। लेकिन इस मामले में पीड़िता और उसके माता-पिता ने अदालत में अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। ऐसे में आरोपी के विरुद्ध लगाए गए दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के आरोप कानूनी रूप से सिद्ध नहीं हो सके।

अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद नहीं हैं। इसी कारण उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में अदालत का निर्णय केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और कानूनी मानकों के आधार पर किया जाता है। जब प्रमुख गवाह अपने पूर्व बयानों का समर्थन नहीं करते, तो अभियोजन पक्ष के लिए आरोपों को सिद्ध करना कठिन हो जाता है, जिसका सीधा असर मुकदमे के परिणाम पर पड़ता है।

 

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