
New Delhi : हरियाणा ने सुधारात्मक न्याय व्यवस्था में बड़ा कदम बढ़ाते हुए राज्य की विभिन्न जेलों में एम्पावरिंग लाइव्स बिहाइंड बार्स परियोजना के तहत कौशल विकास केंद्रों, पॉलिटेक्निक डिप्लोमा पाठ्यक्रमों और आईटीआई-स्तरीय व्यावसायिक कार्यक्रमों की शुरुआत कर दी। इस राष्ट्रीय पहल का आगाज़ जिला जेल भोंडसी, गुरुग्राम से हुआ। इसी अवसर पर पंजाब, हरियाणा और यूटी चंडीगढ़ में एक माह चलने वाले राज्यव्यापी नशा-रोधी जागरूकता अभियान की भी शुरुआत की गई।
कार्यक्रम में अनेक वरिष्ठ न्यायाधीशों तथा प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति रही जिन्होंने सुधारात्मक न्याय, पुनर्वास और समाजिक पुनर्स्थापन के लिए इन पहलों को समय की आवश्यकता बताया। हालसा की कार्यकारी चेयरपर्सन न्यायमूर्ति लीसा गिल द्वारा दिशा-निर्देशित नशा-रोधी अभियान को भी इन प्रयासों के केंद्र में रखा गया है।
कार्यक्रम के दौरान कहा गया कि जेल से बाहर आने के बाद यदि व्यक्ति को शिक्षा, कौशल और मनोवैज्ञानिक समर्थन उपलब्ध न हो तो उसके समाज में पुनर्वास की प्रक्रिया कठिन हो जाती है। सुधार गृहों में शिक्षा, प्रशिक्षण और मानसिक परामर्श की संरचित व्यवस्था किए बिना पुनरावृत्ति को रोकना संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से प्रत्येक जिले में पुनर्वास बोर्ड गठित करने, प्रोबेशन अधिकारियों, उद्योग प्रतिनिधियों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को पुनर्वास योजना में शामिल करने का सुझाव दिया गया।
प्रवासी मजदूरों की विशेष संवेदनशीलताओं को पहचानते हुए सरल ज़मानत, बहुभाषीय कानूनी सहायता और दस्तावेज़ी मदद उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया गया। साथ ही मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग को व्यावसायिक प्रशिक्षण के साथ जोड़ने और डिजिटल कौशल, लॉजिस्टिक सेवाओं तथा आधुनिक ट्रेडों को प्रशिक्षण का हिस्सा बनाने की बात कही गई। उद्योग जगत से अपील की गई कि वे जेलों में चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अपनाएं, अप्रेंटिसशिप दें और प्रशिक्षित बंदियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएं।
कार्यक्रम में ब्रिटेन में अपनाए जा रहे एक नवोन्मेषी मॉडल का भी उल्लेख हुआ जिसमें कैदियों को निगरानी चिप लगाकर घर पर रहने की अनुमति दी जाती है ताकि उनका पारिवारिक जीवन और आय प्रभावित न हो। यह मॉडल सुरक्षा और पुनर्वास के बीच संतुलन स्थापित करता है।
सुधारात्मक न्याय को मजबूत करने के लिए विभिन्न वक्ताओं ने समाजिक स्वीकार्यता को सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताया। कहा गया कि जब तक समाज पुनर्वासित व्यक्तियों को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक किसी भी व्यवस्था का प्रभाव सीमित रहेगा। जेलों को अवसर, पुनर्निमाण और नई शुरुआत के केंद्र बनाने पर जोर दिया गया।
हरियाणा प्रशासन ने आश्वासन दिया कि न्यायिक मंथन से निकले सुझावों को मूर्त रूप देने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। राज्य की जेलों में शुरू किए गए कौशल विकास और पॉलिटेक्निक कार्यक्रमों ने न्याय व्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ा है। अब बंदियों को कोपा, वेल्डर, प्लंबर, ड्रेस मेकिंग, इलेक्ट्रिशियन, वुडवर्क तकनीशियन, सिलाई तकनीक, कॉस्मेटोलॉजी जैसे आईटीआई ट्रेडों तथा कंप्यूटर इंजीनियरिंग में तीन वर्षीय पॉलिटेक्निक डिप्लोमा का अवसर मिलेगा। उद्देश्य है— बंदियों को आत्मनिर्भर, सक्षम और समाज में सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बनाना।
ये पहलें जेलों को बंदीगृह की अवधारणा से आगे ले जाकर उन्हें सीखने और आत्मविकास के केंद्रों में बदल रही हैं। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, अपराध की पुनरावृत्ति कम होगी और समाज अधिक सुरक्षित तथा संवेदनशील बनेगा।
हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा शुरू किया गया नशा-रोधी अभियान समाज में बढ़ते नशे के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर जनजागृति करेगा। इसमें छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और समुदायों के लिए जागरूकता कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, काउंसलिंग कैंप, कानूनी साक्षरता सत्र और सोशल मीडिया अभियान शामिल हैं।
कार्यक्रम में हरियाणा के मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी, एसीएस गृह, जेल एवं न्यायिक डॉ सुमिता मिश्रा, गृह विभाग की सचिव आमना तसनीम, महानिदेशक जेल आलोक राय, महानिरीक्षक कारागार बी सतीश बालन, जीएमडीए के सीईओ पी सी मीणा, गुरुग्राम के डीसी अजय कुमार, सीपी विकास अरोड़ा, नगर निगम मानेसर के आयुक्त प्रदीप सिंह, जेल अधीक्षक विवेक चौधरी, जिला एवं सत्र न्यायालय के अधिकारी तथा जिले की विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
इन पहलों ने साबित किया कि जब व्यवस्था शिक्षा, कौशल विकास, पुनर्वास और समुदाय की भागीदारी को प्राथमिकता देती है, तो परिवर्तन न केवल संभव बल्कि स्थायी भी बन जाता है।





