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New Delhi : AIIMS जहां चिकित्सा उत्कृष्टता के सामने आम आदमी की परीक्षा शुरू होती है

New Delhi : भारत ‘विकसित भारत’ का सपना देख रहा है, लेकिन देश के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल में इलाज तक पहुंच आज भी कई बार संपर्क, प्रभाव और अंतहीन प्रतीक्षा पर निर्भर होती दिखाई देती है।

नई दिल्ली में केवल एक अस्पताल नहीं है। गंभीर और जटिल बीमारियों से जूझ रहे लाखों भारतीयों के लिए यह अंतिम उम्मीद का केंद्र है। मरीज सैकड़ों, बल्कि हजारों किलोमीटर की यात्रा करके यहां इस विश्वास के साथ पहुंचते हैं कि यदि कहीं इलाज संभव है, तो वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान—एम्स—में मिलेगा। यहां के डॉक्टरों, विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और चिकित्सा सुविधाओं ने देश-विदेश में अपार प्रतिष्ठा अर्जित की है। एम्स ने राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों का उपचार किया है, लेकिन इसके साथ ही उन असंख्य गरीब मरीजों को भी चिकित्सा उपलब्ध कराई है जो निजी अस्पतालों का खर्च वहन नहीं कर सकते।

लेकिन इस असाधारण चिकित्सा प्रतिष्ठा के पीछे एक दूसरी वास्तविकता भी मौजूद है—मरीजों से भरे गलियारे, भ्रमित लोग, जटिल प्रक्रियाएं, लंबी प्रतीक्षा और ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था, जिससे जूझना एक सामान्य नागरिक के लिए बेहद कठिन हो सकता है।

शुक्रवार को मुझे स्वयं एम्स के इसी पक्ष का अनुभव हुआ। मेरा न्यूरोलॉजी विभाग में एक एसोसिएट प्रोफेसर से अपॉइंटमेंट था। विभाग पुराने मुख्य अस्पताल परिसर, जिसे आमतौर पर लाल बिल्डिंग कहा जाता है, में स्थित है। जो एक सामान्य चिकित्सकीय परामर्श होना चाहिए था, वह ऐसा अनुभव बन गया जिसने भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कहीं बड़े सवाल खड़े कर दिए।

एम्स के प्रवेश द्वार पर एक सुरक्षाकर्मी ने शुरुआत में मुझे आगे जाने से रोकने का प्रयास किया। कारण बताया गया कि भीतर कोई वीआईपी मौजूद हैं। मुझे बताया गया कि उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन वहां आए हुए हैं। वहां उपराष्ट्रपति थे या कोई अन्य गणमान्य व्यक्ति—यह मूल प्रश्न नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी वीआईपी की मौजूदगी के कारण उन मरीजों की अस्पताल तक पहुंच कठिन होनी चाहिए, जिन्होंने पहले ही बड़ी मशक्कत से डॉक्टर का अपॉइंटमेंट हासिल किया है?

संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की सुरक्षा आवश्यक और स्वाभाविक है, लेकिन अस्पताल अन्य सार्वजनिक स्थलों से अलग होते हैं। अस्पताल में आने वाले लोग किसी समारोह के अतिथि नहीं होते। उनमें से अनेक बीमार, बुजुर्ग और शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं या अपने गंभीर रूप से बीमार परिजनों को लेकर आए होते हैं। इसलिए अस्पताल में मरीजों की आवाजाही और उनकी चिकित्सकीय जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

प्रवेश द्वार की बाधा पार करने के बाद मैं आखिरकार न्यूरोलॉजी विभाग पहुंचा। वहां का दृश्य अभिभूत कर देने वाला था। विभाग और आसपास के क्षेत्रों में मरीजों और उनके परिजनों की भारी भीड़ थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सैकड़ों लोग डॉक्टर से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कोई बैठा था, कोई खड़ा था और कई लोग यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर उन्हें जाना कहां है। संस्थान पर मरीजों का असाधारण दबाव साफ दिखाई दे रहा था।

जब मैंने डॉक्टर के सहायक से संपर्क किया तो मुझे बताया गया कि मेरे दस्तावेज पर्याप्त नहीं हैं और आवश्यक रेफरल अथवा संदर्भ उपलब्ध नहीं है। मैंने अपनी स्थिति समझाने की कोशिश की, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी।

यहीं से एक सामान्य मरीज की समस्या वास्तव में समझ में आती है। न्यूरोलॉजी या किसी अन्य गंभीर बीमारी के इलाज के लिए एम्स आने वाला व्यक्ति पहले से ही मानसिक तनाव और चिंता में होता है। यदि इसके बाद उसे दस्तावेजों की अस्पष्ट आवश्यकताओं, रेफरल की जटिलताओं और इस अनिश्चितता से जूझना पड़े कि आखिर मदद के लिए किससे संपर्क किया जाए, तो प्रशासनिक प्रक्रिया स्वयं उसके तनाव को कई गुना बढ़ा देती है।

काफी प्रयास के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। मैं इतना उलझ गया और निराश हुआ कि बिना डॉक्टर को दिखाए एम्स से बाहर निकलने का निर्णय कर लिया। बाहर जाते समय मेरी नजर निदेशक कार्यालय पर पड़ी। एक पत्रकार के रूप में मैंने सोचा कि जाने से पहले अपने अनुभव के बारे में प्रशासन को अवश्य बताना चाहिए।

निदेशक उपलब्ध नहीं थे, लेकिन मेरी मुलाकात उनके निजी सचिव श्री प्रकाश कंडपाल से हुई। मैंने उन्हें पूरी स्थिति बताई। श्री कंडपाल ने धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी और तत्काल सहयोग किया। उन्होंने सहायता की व्यवस्था की और सुरक्षाकर्मियों को मेरे साथ न्यूरोलॉजी विभाग भेजा। अंततः समस्या का समाधान हुआ। डॉक्टर ने धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी, पूरी पेशेवर संवेदनशीलता के साथ परामर्श दिया और मेरी चिकित्सकीय जांच पूरी हुई।

मैं श्री कंडपाल की सहायता के लिए आभारी हूं और उस डॉक्टर की पेशेवर संवेदनशीलता की भी सराहना करता हूं जिन्होंने मुझे देखा। लेकिन विडंबना यह है कि मेरी समस्या का सफल समाधान ही मेरी यात्रा का सबसे चिंताजनक सवाल बन गया—अगर मैं पत्रकार नहीं होता तो क्या होता?

मान लीजिए मेरी जगह बिहार के किसी दूरदराज जिले का किसान होता, उत्तर प्रदेश का कोई मजदूर होता, राजस्थान से आया कोई बुजुर्ग दंपती होता, झारखंड का कोई गरीब परिवार होता या ऐसा व्यक्ति होता जिसने केवल दिल्ली पहुंचने के लिए पैसे उधार लिए हों। उसे निदेशक कार्यालय तक कौन पहुंचाता? उसकी समस्या कौन सुनता? उसकी मदद के लिए कौन किसी कर्मचारी को भेजता? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—ऐसे हस्तक्षेप की आवश्यकता ही क्यों पड़नी चाहिए?

सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान ऐसी व्यवस्था पर नहीं चल सकता जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच रखने वाला व्यक्ति व्यवस्था की बाधाओं को पार कर जाए, जबकि बाकी लोग कतारों, कागजी प्रक्रियाओं और अपनी किस्मत के भरोसे रहें।

व्यवस्था उस व्यक्ति के लिए भी काम करनी चाहिए जो किसी को नहीं जानता।

एम्स पर मरीजों के भारी दबाव के लिए केवल उसके प्रशासन को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। समस्या इससे कहीं अधिक संरचनात्मक है। एम्स नई दिल्ली वास्तव में पूरे देश का रेफरल अस्पताल बन चुका है। मरीज केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से नहीं आते, बल्कि बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड, मध्य प्रदेश और लगभग पूरे भारत से यहां पहुंचते हैं।

इसका कारण यह है कि देशभर में चिकित्सा ढांचे के विस्तार के बावजूद एम्स दिल्ली और अनेक अन्य संस्थानों के बीच जनता के भरोसे का बड़ा अंतर अभी भी मौजूद है।

सरकार ने देश के विभिन्न हिस्सों में कई नए एम्स स्थापित किए हैं। विशेषीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की दिशा में यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन केवल इमारतें बना देने से स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण नहीं हो सकता।

मरीज सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके दिल्ली आना तभी बंद करेंगे जब उन्हें भरोसा होगा कि उसी स्तर के विशेषज्ञ, जांच सुविधाएं, उपचार मानक और संस्थागत विश्वसनीयता उनके घर के नजदीक भी उपलब्ध हैं। जब तक यह भरोसा विकसित नहीं होता, एम्स दिल्ली मरीजों का ऐसा दबाव झेलता रहेगा जो दुनिया के लगभग किसी भी अस्पताल की क्षमता की परीक्षा ले सकता है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों के अपॉइंटमेंट के लिए लंबी प्रतीक्षा एक और गंभीर समस्या है। विभाग और उपलब्धता के अनुसार मरीजों को कई सप्ताह या महीनों बाद की तारीख मिल सकती है। कुछ अत्यधिक विशिष्ट विभागों में प्रतीक्षा इससे भी अधिक हो सकती है।

किसी प्रशासक के लिए साठ या नब्बे दिन कंप्यूटर पर दर्ज एक तारीख हो सकती है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज के लिए साठ या नब्बे दिन अंतहीन प्रतीक्षा है। बीमारी अपॉइंटमेंट कैलेंडर के अनुसार नहीं चलती। किसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी, हृदय रोग या संभावित कैंसर से यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पताल में जगह मिलने तक वह इंतजार करे।

चिकित्सकीय आवश्यकता की तात्कालिकता और संस्थागत क्षमता के बीच यह अंतर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है और इस पर कहीं अधिक नीतिगत ध्यान देने की जरूरत है।

यह विरोधाभास इसलिए और स्पष्ट हो जाता है क्योंकि एम्स देश के अनेक प्रभावशाली लोगों की भी पहली पसंद बना हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने भी हाल में एम्स में उपचार कराया और स्वस्थ होने के बाद उन्हें छुट्टी दी गई। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। बल्कि मंत्री और वरिष्ठ सार्वजनिक व्यक्तियों का सरकारी अस्पताल में इलाज कराना सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में उनके विश्वास का संकेत है।

समस्या तब पैदा होती है जब उसी संस्थान में दो अलग-अलग अनुभव विकसित होने लगें—एक उनके लिए जिनके पास पहुंच है और दूसरा उनके लिए जिनके पास कोई पहुंच नहीं है।

मंत्री, वरिष्ठ नौकरशाह या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति की सुरक्षा और प्रोटोकॉल की आवश्यकताएं स्वाभाविक हैं। लेकिन एम्स की वास्तविक कसौटी यह नहीं हो सकती कि वह उस व्यक्ति का इलाज कितनी कुशलता से करता है जिसका नाम हर कोई जानता है। उसकी असली परीक्षा यह है कि वह उस मरीज के साथ कैसा व्यवहार करता है जिसका नाम कोई नहीं जानता।

इन परिस्थितियों के लिए एम्स के डॉक्टरों को दोष देना भी पूरी तरह अनुचित होगा। वास्तविकता इसके विपरीत है। एम्स के डॉक्टर, रेजिडेंट, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी असाधारण दबाव में काम करते हैं। कई विशेषज्ञ प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज देखते हैं और साथ ही शिक्षण, शोध, आपातकालीन सेवाओं तथा जटिल मामलों की जिम्मेदारी भी संभालते हैं।

मेरा स्वयं का अनुभव भी इस अंतर की पुष्टि करता है। एक बार डॉक्टर तक पहुंचने के बाद उन्होंने मेरी बात धैर्य से सुनी और पूरी पेशेवर जिम्मेदारी के साथ परामर्श दिया।

वास्तविक कमजोरी उस व्यवस्था में दिखाई देती है जिसे ‘पेशेंट-सिस्टम इंटरफेस’ कहा जा सकता है—अर्थात अस्पताल के गेट से प्रवेश करने से लेकर डॉक्टर तक पहुंचने की पूरी यात्रा।

रजिस्ट्रेशन, रेफरल, अपॉइंटमेंट, सुरक्षा, दस्तावेज, विभाग तक पहुंच, प्रतीक्षा स्थल, सूचना व्यवस्था और शिकायत निवारण देखने में प्रशासनिक विषय लग सकते हैं, लेकिन मरीज के लिए यही चीजें उसके पूरे स्वास्थ्य अनुभव को निर्धारित करती हैं।

भारत के पास किसी कमरे में विश्वस्तरीय न्यूरोलॉजिस्ट हो सकता है, लेकिन यदि कोई बुजुर्ग मरीज यह नहीं समझ पाए कि उस कमरे तक कैसे पहुंचना है, तो उस चिकित्सा उत्कृष्टता का एक हिस्सा वहीं खो जाता है।

सुरक्षाकर्मियों के व्यवहार पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। एम्स को मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है। प्रतिदिन हजारों लोग परिसर में प्रवेश करते हैं, आपात स्थितियां पैदा होती हैं, वीआईपी आते हैं और भीड़ का प्रबंधन करना पड़ता है। लेकिन मरीज सबसे पहले अक्सर सुरक्षाकर्मी से ही मिलता है। इसलिए उसका व्यवहार महत्वपूर्ण है।

अस्पताल पहुंचने वाला मरीज आमतौर पर चिंतित, परेशान या शारीरिक रूप से अस्वस्थ होता है। उसके परिजन भी मानसिक दबाव में होते हैं। ऐसे में सुरक्षा कर्मचारियों को मरीजों से व्यवहार के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जहां आवश्यकता हो वहां दृढ़ता जरूरी है, लेकिन अहंकार नहीं।

एम्स में प्रवेश करने वाला बीमार व्यक्ति कोई घुसपैठिया नहीं है। वही इस संस्थान के अस्तित्व का कारण है।

भारत का ‘विकसित भारत’ बनने का सपना सही और महत्वाकांक्षी है। हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की बात करते हैं। हम एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डों, डिजिटल बुनियादी ढांचे, तकनीकी प्रगति, विनिर्माण क्षमता और दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव का उत्सव मनाते हैं। ये सभी उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं। लेकिन विकास का वास्तविक अनुभव अंततः नागरिक को होना चाहिए।

क्या कोई बुजुर्ग नागरिक बिना किसी प्रभाव का इस्तेमाल किए विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच सकता है? क्या किसी गांव से आया व्यक्ति अस्पताल की व्यवस्था समझ सकता है या उसे एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भटकना पड़ेगा? क्या दूसरे राज्य से आया परिवार पहले से जान सकता है कि उसे कहां जाना है और उसके मरीज को लगभग कब देखा जाएगा? क्या तकनीक अनावश्यक कतारों को खत्म कर सकती है? क्या गरीब व्यक्ति को वही प्रशासनिक सम्मान मिल सकता है जो किसी मंत्री या वरिष्ठ नौकरशाह को मिलता है?

ये प्रश्न ‘विकसित भारत’ की अवधारणा के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने राजमार्ग, जीडीपी के आंकड़े और गगनचुंबी इमारतें।

आगे का रास्ता एम्स को नए सिरे से बनाने में नहीं, बल्कि पहले से मौजूद इस उत्कृष्ट चिकित्सा संस्थान को आम आदमी के लिए अधिक सुलभ बनाने में है।

हर प्रमुख प्रवेश द्वार पर पेशेवर पेशेंट नेविगेशन और सहायता केंद्र होना चाहिए, जहां मरीज अपना अपॉइंटमेंट स्लिप, रेफरल या चिकित्सा दस्तावेज दिखाकर तुरंत स्पष्ट जानकारी प्राप्त कर सके।

एक रियल-टाइम डिजिटल क्यू मैनेजमेंट सिस्टम होना चाहिए जो एसएमएस, मोबाइल नोटिफिकेशन और डिस्प्ले बोर्ड के माध्यम से मरीजों को बताए कि उनकी बारी लगभग कब आएगी। इससे हजारों लोगों को विभागों के बाहर अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा करने से बचाया जा सकता है।

हर प्रमुख विभाग में एक अधिकार-संपन्न रोगी सुविधा अधिकारी होना चाहिए जो दस्तावेज, रेफरल और अपॉइंटमेंट से जुड़ी समस्याओं का तत्काल समाधान कर सके, ताकि परेशान मरीजों को वरिष्ठ अधिकारियों की तलाश में भटकना न पड़े।

सुरक्षाकर्मियों के लिए संवाद और मरीजों के प्रति संवेदनशीलता का प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए। वीआईपी प्रोटोकॉल की भी समीक्षा होनी चाहिए, ताकि आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद सामान्य मरीजों की आवाजाही कम से कम प्रभावित हो।

एम्स को विभागवार अपॉइंटमेंट, जांच और प्रमुख चिकित्सा प्रक्रियाओं की अनुमानित प्रतीक्षा अवधि सार्वजनिक करने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि मरीज अपनी परिस्थितियों के अनुसार सूचित निर्णय ले सकें।

राज्य मेडिकल कॉलेजों और क्षेत्रीय अस्पतालों को एम्स विशेषज्ञों से जोड़ने वाली टेलीमेडिसिन और दूरस्थ परामर्श सेवाओं का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए। प्रत्येक चरण में हर मरीज का दिल्ली आना आवश्यक नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि देश के नए एम्स और प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेजों को वास्तविक अर्थों में उत्कृष्टता के केंद्र बनाया जाए। एम्स दिल्ली की भीड़ का दीर्घकालिक समाधान आंशिक रूप से दिल्ली के बाहर ही मौजूद है।

यदि पटना, गोरखपुर, भोपाल, जोधपुर, रायपुर, ऋषिकेश और अन्य क्षेत्रीय केंद्रों में उच्च गुणवत्ता वाली विशेषीकृत चिकित्सा पर जनता का समान भरोसा कायम हो जाए, तो हजारों परिवारों को इलाज के लिए दिल्ली आने की मजबूरी नहीं रहेगी।

सरकार द्वारा एम्स नेटवर्क के विस्तार की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने नए एम्स खोले गए, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उन्होंने मरीजों की एम्स नई दिल्ली पर निर्भरता कितनी कम की।

मेरी एम्स यात्रा अंततः सफल रही। मैंने डॉक्टर को दिखाया, परामर्श पूरा किया और घर लौट आया। लेकिन इसे संतोषजनक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

एम्स से बाहर निकलते समय मेरे मन में सवाल यह नहीं था कि मेरा इलाज हुआ या नहीं। सवाल यह था कि क्या मेरे जैसी स्थिति में कोई ऐसा व्यक्ति भी समाधान तक पहुंच पाता जिसके पास मेरी पेशेवर पहचान और पहुंच नहीं होती?

यह अंतर नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

एम्स भारत की महानतम सार्वजनिक संस्थाओं में से एक है। उसकी चिकित्सा उत्कृष्टता पर कोई सवाल नहीं है। डॉक्टरों, नर्सों, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्यकर्मियों की कई पीढ़ियों ने ऐसा संस्थान खड़ा किया है जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त है।

उसकी प्रशासनिक कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाना एम्स पर हमला नहीं है। बल्कि यह एम्स को उसकी अपनी चिकित्सा उत्कृष्टता के अनुरूप बनाने का आग्रह है।

सरकार शायद हर शहर में दूसरा एम्स नई दिल्ली न बना सके और संभवतः इसकी आवश्यकता भी नहीं है। लेकिन मौजूदा संस्थान को बेहतर जरूर बनाया जा सकता है—अपॉइंटमेंट को अधिक पारदर्शी, कतारों को अधिक व्यवस्थित, सुरक्षा व्यवस्था को अधिक मानवीय, अस्पताल के भीतर मार्गदर्शन को अधिक सरल और क्षेत्रीय स्वास्थ्य संस्थानों को अधिक मजबूत बनाकर।

भारत की स्वास्थ्य क्रांति को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि कितने अस्पताल खुले, कितने मेडिकल कॉलेज शुरू हुए या स्वास्थ्य बजट में कितनी राशि घोषित हुई। उसकी वास्तविक कसौटी यह होगी कि जब कोई अनजान नागरिक सरकारी अस्पताल के दरवाजे पर पहुंचे तो उसके साथ क्या होता है।

यदि उस व्यक्ति का सम्मान के साथ स्वागत हो, उसे सही मार्गदर्शन मिले, उसे बीमारी की गंभीरता के अनुरूप व्यावहारिक समय में अपॉइंटमेंट मिले और उसे किसी सिफारिश, प्रभाव या संपर्क की तलाश किए बिना चिकित्सा विशेषज्ञता तक पहुंच मिल सके, तो भारत प्रशासनिक दक्षता से कहीं बड़ी उपलब्धि हासिल कर चुका होगा—एक वास्तविक लोकतांत्रिक स्वास्थ्य व्यवस्था।

जिस दिन देश के सबसे गरीब गांव से आया एक अनजान मरीज बिना भय के एम्स में प्रवेश कर सकेगा, बिना किसी प्रभाव के सही विभाग तक पहुंच सकेगा, उचित समय में डॉक्टर का अपॉइंटमेंट पा सकेगा और अस्पताल के सुरक्षा द्वार से लेकर डॉक्टर के परामर्श कक्ष तक उसके साथ गरिमा और सम्मान का व्यवहार होगा, वह दिन किसी भी नारे की तुलना में ‘विकसित भारत’ का कहीं अधिक विश्वसनीय प्रतीक होगा।

तब तक भारत के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान के भीड़भरे गलियारे हमें चिकित्सा उत्कृष्टता और आम आदमी के लिए सुलभ स्वास्थ्य सेवा के बीच मौजूद दूरी की याद दिलाते रहेंगे।

एम्स में एक सामान्य नागरिक को किसी वीआईपी को जानने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सामान्य नागरिक ही सबसे बड़ा वीआईपी होना चाहिए।

डॉ. अनिल सिंह
संपादक, STAR Views एवं टॉप स्टोरी

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SHAHRUKH KHAN

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