Moscow : ऐसे समय में जब पारंपरिक कूटनीति गंभीर दबावों का सामना कर रही है, विश्वभर से आए प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने मॉस्को को संस्कृतियों, सभ्यताओं और परिवर्तनकारी विचारों के एक जीवंत वैश्विक मिलन-स्थल में बदल दिया है। ये प्रतिनिधि द्वितीय विश्व जन सभा में भाग लेने के लिए एकत्रित हुए हैं। यह एक महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों के लोगों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क और संवाद को मजबूत करना है।

सभा के प्रमुख सत्र 18 और 19 सितंबर को मॉस्को इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर में आयोजित किए जा रहे हैं। हालांकि, इसके व्यापक कार्यक्रम की शुरुआत 16 और 17 सितंबर से ही हो गई थी, जब प्रतिभागियों का आगमन शुरू हुआ और विभिन्न सेमिनारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, फिल्म महोत्सव तथा विज्ञान, कला, शिक्षा और मानवीय सहयोग से जुड़े विशेष मंचों का आयोजन किया गया।
इस वर्ष सभा का विषय है—“न्यू वर्ल्ड: वैल्यूज़ दैट यूनाइट” अर्थात “नया विश्व: वे मूल्य जो हमें एकजुट करते हैं।” आधिकारिक कार्यक्रम में इस आयोजन को शांति, सहयोग, सार्वजनिक कूटनीति और सतत विकास को समर्पित एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
आयोजकों और कार्यक्रम स्थल से प्राप्त अनुमानों के अनुसार, सभा और उससे जुड़ी गतिविधियों में लगभग 5,000 प्रतिभागी सम्मिलित हो रहे हैं। इस आयोजन में नागरिक समाज, गैर-सरकारी संगठनों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों, मीडिया संगठनों, व्यावसायिक समूहों, युवा संगठनों और सार्वजनिक कूटनीति से जुड़े नेटवर्कों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से आए प्रतिनिधियों की उल्लेखनीय उपस्थिति ने इस सभा को यूरोप की सीमाओं से कहीं आगे विस्तृत एक वास्तविक वैश्विक पहचान प्रदान की है।
इस सभा का महत्व केवल इसके विशाल आकार में नहीं, बल्कि इसकी भागीदारी के विशिष्ट स्वरूप में भी निहित है। यह राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों के प्रभुत्व वाला कोई अंतर-सरकारी शिखर सम्मेलन नहीं है। यह मुख्य रूप से आम लोगों, सामाजिक संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी पर आधारित पहल है। इसका उद्देश्य औपचारिक कूटनीतिक व्यवस्था से इतर और उससे आगे बढ़कर लेखकों, शिक्षकों, कलाकारों, पत्रकारों, विद्वानों, उद्यमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवा नेतृत्व के बीच संबंधों का निर्माण करना है।
इस आयोजन की आयोजक संस्था ‘असेंबली ऑफ द पीपल्स ऑफ द वर्ल्ड’ स्वयं को गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक रूप से सक्रिय नागरिकों का एक अंतरराष्ट्रीय संघ बताती है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक अथवा जन-कूटनीति के माध्यम से मित्रता, सद्भाव, साझेदारी, अच्छे पड़ोसी संबंधों और सामाजिक एकीकरण को प्रोत्साहित करना है।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकारें संधियों पर बातचीत करती हैं और रणनीतिक हितों का प्रबंधन करती हैं, लेकिन राष्ट्रों के संबंध पूरी तरह आधिकारिक संवाद पर निर्भर नहीं रह सकते। राजनीतिक मतभेद औपचारिक संवाद को बाधित कर सकते हैं, जबकि शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, पत्रकारिता और व्यावसायिक सहयोग के माध्यम से निर्मित मानवीय संबंध प्रायः कूटनीतिक तनाव के दौर में भी बने रहते हैं। मॉस्को की यह सभा इसी विश्वास पर आधारित है कि ऐसे संबंध राजनीतिक मतभेदों को समाजों के बीच स्थायी विभाजन में बदलने से रोक सकते हैं।
सभा का वातावरण भी इसी आकांक्षा को प्रतिबिंबित करता है। एक ही छत के नीचे विभिन्न भाषाओं, राष्ट्रीय परिधानों, सांस्कृतिक परंपराओं और बौद्धिक दृष्टिकोणों की विविधता दिखाई दे रही है। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और ऐतिहासिक अनुभवों वाले देशों के प्रतिनिधि शांति, मानवीय गरिमा, युवाओं के भविष्य, जिम्मेदार प्रौद्योगिकी, सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण तथा पारस्परिक सम्मान पर आधारित अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे साझा विषयों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
इस आयोजन के कार्यक्रम में विषयों की असाधारण रूप से व्यापक शृंखला शामिल है। विभिन्न सत्र मानवीय आधुनिकीकरण, सांस्कृतिक कूटनीति, ऐतिहासिक स्मृति, शिक्षा, सतत विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, परिवार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मीडिया की जिम्मेदारी, अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक सहयोग, पर्यटन, कला, साहित्य और अंतरधार्मिक संवाद को समर्पित हैं। युवा प्रतिभागी वर्ष 2035 के विश्व की परिकल्पना पर विमर्श कर रहे हैं। इसमें यह प्रश्न भी शामिल है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानव विकास के उपकरण के रूप में अपनाया जाना चाहिए अथवा उसके प्रति अधिक सतर्क दृष्टिकोण रखा जाना चाहिए।
कार्यक्रम के अंतर्गत “मानवता की सेवा में मीडिया” शीर्षक से एक महत्वपूर्ण मीडिया मंच भी आयोजित किया जा रहा है। रूस, भारत, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और अमेरिका के पत्रकार तथा मीडिया विशेषज्ञ इस बात पर विचार कर रहे हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुष्प्रचार और डिजिटल हेरफेर के युग में पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता और नैतिक मानदंडों को कैसे सुरक्षित रखते हुए अंतरराष्ट्रीय संवाद को आगे बढ़ा सकती है।
इस मंच से जिम्मेदार पत्रकारिता के ऐसे सिद्धांत तैयार किए जाने की अपेक्षा है, जिनमें तथ्यात्मक शुद्धता, पेशेवर नैतिकता, सांस्कृतिक समझ और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को प्रमुखता दी जाएगी। घोषित प्रतिभागियों में भारत, मिस्र, ब्राजील, तंजानिया, केन्या, मेक्सिको, फिनलैंड, ऑस्ट्रिया और कई अन्य देशों के पत्रकार तथा सार्वजनिक बुद्धिजीवी शामिल हैं।
सभा का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम ऐतिहासिक स्मृति पर इसका विशेष ध्यान है। रूस और अमेरिका के विशेषज्ञ द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण के दौरान एल्बे नदी पर सोवियत और अमेरिकी सेनाओं की ऐतिहासिक मुलाकात की स्मृति से जुड़े “स्पिरिट ऑफ द एल्बे” की निरंतर प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
प्रस्तावित पहल का उद्देश्य इस ऐतिहासिक स्मृति को अनुसंधान, शिक्षा और युवा संवाद के एक स्थायी मंच में परिवर्तित करना है। इसका व्यापक संदेश यह है कि गंभीर राजनीतिक मतभेदों का सामना कर रहे देशों के बीच भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग संभव है। इतिहास को यदि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखा जाए तो वह केवल पिछले संघर्षों की याद नहीं रहता, बल्कि भविष्य के सहयोग का एक सेतु भी बन सकता है।
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की मजबूत भागीदारी बदलते हुए वैश्विक विमर्श को दर्शाती है। जिन देशों और समुदायों को ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय निर्णय-प्रक्रिया की परिधि पर रखा गया, वे अब विश्व का भविष्य निर्धारित करने में बड़ी भूमिका की मांग कर रहे हैं। इन क्षेत्रों के प्रतिनिधि मॉस्को में केवल पर्यवेक्षक बनकर नहीं आए हैं। वे शिक्षा, आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक संरक्षण, मीडिया, प्रौद्योगिकी, सतत विकास और आधुनिक समाज में पारंपरिक ज्ञान के स्थान से जुड़े ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत कर रहे हैं।
अफ्रीका के लिए यह सभा शैक्षणिक, सांस्कृतिक और मीडिया साझेदारियों के विस्तार का अवसर प्रदान करती है। अफ्रीकी प्रतिनिधि अपने महाद्वीप की युवा आबादी, विकास संबंधी आवश्यकताओं, सांस्कृतिक विविधता और अधिक प्रतिनिधित्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बढ़ती मांग से निर्मित दृष्टिकोण सामने रख रहे हैं।
लैटिन अमेरिका के लिए यह सभा सामाजिक समावेशन, राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक स्वतंत्रता और विकास के वैकल्पिक मॉडलों पर चर्चा करने के लिए एक अतिरिक्त मंच उपलब्ध कराती है। इस क्षेत्र के प्रतिनिधि विभिन्न महाद्वीपों के साथ साझेदारी विकसित करते हुए राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के महत्व को भी रेखांकित कर रहे हैं।
एशियाई भागीदारी प्राचीन सभ्यताओं, तीव्र प्रौद्योगिकी परिवर्तन और ग्लोबल साउथ के बढ़ते प्रभाव से निर्मित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। एशिया के प्रतिनिधि इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि आर्थिक प्रगति को सभ्यतागत पहचान, सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के साथ किस प्रकार संतुलित किया जा सकता है।
ऐसे मंच में भारत का स्वाभाविक और संभावित रूप से महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय सभ्यता ने ऐतिहासिक रूप से “वसुधैव कुटुम्बकम्”—विश्व एक परिवार है—के विचार को बढ़ावा देते हुए विभिन्न संस्कृतियों और आस्थाओं की विशिष्टता का सम्मान किया है। भारत की लोकतांत्रिक विविधता, आध्यात्मिक परंपराएं, सभ्यतागत आत्मविश्वास और रूस के साथ दीर्घकालीन मैत्रीपूर्ण संबंध सार्वजनिक कूटनीति में महत्वपूर्ण योगदान देने का मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
भारत के अकादमिक और मीडिया प्रतिनिधियों ने सभा के विचार-विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज की प्राचार्य प्रोफेसर सविता रॉय और प्रोफेसर मनीष चौधरी ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत तथा परिवार व्यवस्था में उभरते परिवर्तनों पर केंद्रित सत्रों को संबोधित किया।
उनके विचारों ने इस बात को रेखांकित किया कि सभ्यतागत मूल्य, सांस्कृतिक निरंतरता और परिवार की बदलती संरचनाएं समकालीन समाज को किस प्रकार प्रभावित कर रही हैं। चर्चा में इस तथ्य पर भी बल दिया गया कि आधुनिकीकरण के लिए सांस्कृतिक जड़ों का परित्याग आवश्यक नहीं है। सामाजिक प्रगति को परिवार, समुदाय और विरासत में मिली परंपराओं के सम्मान के साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।
टॉप स्टोरी और अमेरिका-आधारित डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क स्टार व्यूज़ के संपादक डॉ. अनिल सिंह ने भी विभिन्न कार्यक्रमों के संवादात्मक सत्रों में भाग लिया। उन्होंने सार्वजनिक कूटनीति, मीडिया की जिम्मेदारी, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और तेजी से विभाजित होते अंतरराष्ट्रीय वातावरण में लोगों के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने के महत्व पर अपने विचार साझा किए।
इस प्रकार, यह सभा भारत को केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक भागीदारी से कहीं अधिक अवसर प्रदान करती है। भारतीय विश्वविद्यालय, मीडिया संस्थान, सांस्कृतिक संगठन, थिंक टैंक और नागरिक-सामाजिक संस्थाएं इस मंच का उपयोग रूस, मध्य एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की संस्थाओं के साथ व्यावहारिक साझेदारियां स्थापित करने के लिए कर सकती हैं। विद्यार्थियों, विद्वानों, पत्रकारों, लेखकों और युवा उद्यमियों के आदान-प्रदान से लोगों के बीच संबंधों को अधिक स्थायी संस्थागत स्वरूप दिया जा सकता है।
यह आयोजन एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी लेकर आया है। बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों का वास्तविक मूल्यांकन अंततः उनके बाद होने वाली ठोस प्रगति के आधार पर किया जाना चाहिए। एकता, शांति और साझा मूल्यों से संबंधित भाषण तभी स्थायी महत्व प्राप्त करेंगे, जब उन्हें शैक्षणिक आदान-प्रदान, संयुक्त अनुसंधान, सांस्कृतिक परियोजनाओं, जिम्मेदार मीडिया साझेदारियों और भाग लेने वाली संस्थाओं के बीच निरंतर संपर्क में परिवर्तित किया जाएगा।
ऐसा प्रतीत होता है कि कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करते समय इस चिंता को ध्यान में रखा गया है। पूर्ण अधिवेशनों में दिए जाने वाले भाषणों के साथ-साथ सभा में परियोजना-संबंधी सत्र, समझौतों पर हस्ताक्षर, व्यावसायिक चर्चाएं, मीडिया संवाद और नेटवर्किंग बैठकें भी शामिल हैं। 19 सितंबर को आयोजित होने वाले समापन कार्यक्रम में सभा की कार्यवाही की समीक्षा किए जाने, मानवता की सेवा में योगदान देने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को सम्मानित किए जाने तथा भविष्य में सहयोग की संभावनाओं की पहचान किए जाने की उम्मीद है।
रूसी संसद के निचले सदन स्टेट ड्यूमा के उपाध्यक्ष अलेक्जेंडर बाबाकोव ने प्रतिभागियों को दिए अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक सहयोग को विश्वास, सांस्कृतिक समझ और एक-दूसरे के हितों के सम्मान से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने सार्वजनिक कूटनीति को ऐसे समय में भी संबंधों को संरक्षित रखने का माध्यम बताया, जब आधिकारिक संवाद विभिन्न प्रतिबंधों और कठिनाइयों का सामना कर रहा हो।
उनका संदेश सभा के केंद्रीय विचारों में से एक को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है—अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए राष्ट्रों को अपनी पहचान छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। जब संबंध समानता, पारस्परिक सम्मान और अलग-अलग सांस्कृतिक अनुभवों को समझने की इच्छा पर आधारित होते हैं, तब विविधता सहयोग और साझेदारी की शक्ति बन सकती है।
मॉस्को से उभरने वाली सबसे प्रभावशाली तस्वीर किसी एक व्यक्ति, भाषण अथवा सत्र की नहीं है। यह विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों लोगों की सामूहिक उपस्थिति है, जो राजनीतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक सीमाओं के पार एक-दूसरे से संवाद करने का प्रयास कर रहे हैं।
द्वितीय विश्व जन सभा अंतरराष्ट्रीय संवाद को टकराव से सहयोग और औपचारिक घोषणाओं से सार्थक मानवीय संबंधों की दिशा में ले जाने का एक प्रयास है। इसका उद्देश्य ऐसा स्थान निर्मित करना है, जहां सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक साझेदारी को परस्पर विरोधी विचारों के रूप में नहीं, बल्कि अधिक संतुलित विश्व व्यवस्था की पूरक नींव के रूप में देखा जाए।
इस आयोजन की सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि मॉस्को में व्यक्त किए गए विचार प्रतिनिधियों के अपने-अपने देशों में लौटने के बाद भी जीवित रहते हैं या नहीं। इसकी वास्तविक परीक्षा भागीदार संगठनों और संस्थाओं के बीच स्थायी साझेदारियों, नियमित आदान-प्रदान, संयुक्त पहलों और मापने योग्य सहयोग की स्थापना से होगी।
फिर भी, वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, यूरोप और विश्व के अन्य क्षेत्रों के लोगों को एक मंच पर लाना अपने आप में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। मॉस्को से उभरता संदेश स्पष्ट है—औपचारिक कूटनीति का संचालन सरकारें कर सकती हैं, लेकिन स्थायी शांति का निर्माण लोगों को भी मिलकर करना होगा।
डॉ. अनिल सिंह
संपादक, टॉप स्टोरी एवं स्टार व्यूज़—अमेरिका-आधारित डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क
टॉप स्टोरी के लिए मॉस्को से डॉ. अनिल सिंह की विशेष रिपोर्ट


