Kidney Transplant Success: मां ने बेटे को किडनी देकर बचाई जान, ब्लड ग्रुप मिसमैच के बावजूद सफल रही सर्जरी

Kidney Transplant Success: मां ने बेटे को किडनी देकर बचाई जान, ब्लड ग्रुप मिसमैच के बावजूद सफल रही सर्जरी

नोएडा। Max Super Speciality Hospital के डॉक्टरों ने एक बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण किडनी ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम देकर 11 वर्षीय बच्चे को नई जिंदगी दी है। इस सर्जरी की सबसे खास बात यह रही कि बच्चे और उसकी मां का ब्लड ग्रुप अलग होने के बावजूद ट्रांसप्लांट सफल रहा। डॉक्टरों ने एडवांस मेडिकल तकनीक और लगातार मॉनिटरिंग की मदद से इस कठिन प्रक्रिया को संभव बनाया।

कक्षा 7 में पढ़ने वाला मास्टर अंश बचपन से ही Chronic Kidney Disease से पीड़ित था। समय के साथ उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। परिवार ने इलाज के लिए मैक्स अस्पताल नोएडा से संपर्क किया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने जांच के बाद बताया कि बच्चे की जान बचाने और उसकी जीवन गुणवत्ता बेहतर करने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट ही स्थायी विकल्प है।

हालांकि परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त डोनर की थी। ऐसे मुश्किल समय में अंश की 37 वर्षीय मां सुमन ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी एक किडनी दान करने का फैसला लिया। लेकिन यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि बच्चे का ब्लड ग्रुप O पॉजिटिव था जबकि उसकी मां का ब्लड ग्रुप B पॉजिटिव था। इस वजह से यह एबीओ-इनकम्पैटिबल यानी ब्लड ग्रुप मिसमैच किडनी ट्रांसप्लांट बन गया, जिसे चिकित्सा जगत की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में गिना जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार, ऐसी स्थिति में शरीर डोनर की किडनी को बाहरी अंग मानकर रिजेक्ट कर सकता है। इस जोखिम को कम करने के लिए मेडिकल टीम ने बच्चे के इम्यून सिस्टम की विशेष तैयारी की। ट्रांसप्लांट से पहले एडवांस डिसेंसिटाइजेशन प्रोटोकॉल अपनाए गए और कई चरणों में उपचार किया गया ताकि शरीर नई किडनी को सुरक्षित रूप से स्वीकार कर सके।

विशेषज्ञों ने बताया कि सर्जरी से पहले बच्चे की लगातार मॉनिटरिंग की गई और उसकी इम्यून प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए विशेष दवाएं दी गईं। डॉक्टरों की टीम ने हर चरण पर सावधानी बरती ताकि ट्रांसप्लांट के बाद अंग रिजेक्शन का खतरा कम से कम रहे।

यूरोलॉजी विभाग के सीनियर डायरेक्टर एवं किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी विभाग के प्रमुख Amit K. Devra ने बताया कि एबीओ-इनकम्पैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट बेहद कॉम्प्लेक्स प्रक्रिया होती है, खासकर बच्चों में। उन्होंने कहा कि मास्टर अंश के मामले में डॉक्टरों की सावधानीपूर्वक तैयारी, समय पर उपचार और लगातार निगरानी के कारण सकारात्मक परिणाम हासिल हुए।

सर्जरी के बाद बच्चे को करीब 22 दिनों तक डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया। इस दौरान उसकी सेहत में लगातार सुधार देखा गया और नई किडनी ने सामान्य रूप से काम करना शुरू कर दिया। डॉक्टरों ने स्थिति स्थिर होने के बाद बच्चे को स्वस्थ हालत में अस्पताल से छुट्टी दे दी।

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीकों की मदद से अब ब्लड ग्रुप मिसमैच ट्रांसप्लांट भी संभव हो रहे हैं। इससे उन मरीजों को नई उम्मीद मिल रही है जिन्हें उपयुक्त डोनर नहीं मिल पाता। यह सफल सर्जरी न केवल चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धि है बल्कि एक मां के त्याग और बेटे को बचाने के जज्बे की प्रेरणादायक मिसाल भी बन गई है।

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