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Time Restricted Feeding: Time Restricted Feeding खाने का समय बदला तो सेहत सुधरी, नई स्टडी में बड़ा खुलासा

Time Restricted Feeding: Time Restricted Feeding खाने का समय बदला तो सेहत सुधरी, नई स्टडी में बड़ा खुलासा

नई दिल्ली, 2 अप्रैल : बदलती जीवनशैली और अनियमित खानपान के बीच एक नई मेडिकल स्टडी ने स्वास्थ्य को लेकर बड़ा संकेत दिया है। अध्ययन के अनुसार, केवल क्या खाया जाए यह ही नहीं, बल्कि कब खाया जाए यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खासतौर पर रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में बढ़ते वजन, बिगड़ते मेटाबॉलिज्म और कमजोर होती हड्डियों जैसी समस्याओं पर खाने का सही समय सकारात्मक असर डाल सकता है।

The Journal of Nutrition में प्रकाशित इस स्टडी में बताया गया है कि टाइम-रिस्ट्रिक्टेड फीडिंग (टीआरएफ) यानी एक निश्चित समय सीमा में भोजन करने से शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी, जिसे Circadian Rhythm कहा जाता है, संतुलित रहती है। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है और कई बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।

इस रिसर्च के प्रमुख वैज्ञानिकों में Padma Shri Prof. Madan M. Godbole और Prof. Naibedya Chattopadhyay शामिल हैं। उनके अनुसार यह अध्ययन रजोनिवृत्ति जैसी स्थिति वाले चूहों पर किया गया, जिसमें दो समूह बनाए गए। एक समूह को बिना समय सीमा के भोजन दिया गया, जबकि दूसरे समूह को तय समय के भीतर ही खाना दिया गया।

परिणामों में सामने आया कि बिना समय सीमा के भोजन करने वाले समूह में शरीर की चर्बी लगभग 37% तक बढ़ गई, ब्लड शुगर का स्तर बिगड़ गया और सूजन के साथ हड्डियों की कमजोरी भी बढ़ी। इसके विपरीत, टाइम-रिस्ट्रिक्टेड फीडिंग अपनाने वाले समूह में वजन बढ़ना लगभग रुक गया, ब्लड शुगर कंट्रोल में 26% तक सुधार देखा गया और सूजन में कमी आई। साथ ही हड्डियों और मांसपेशियों को भी बेहतर सुरक्षा मिली।

स्टडी में टीआरएफ की तुलना Liraglutide नामक दवा से भी की गई। नतीजों में पाया गया कि टीआरएफ का असर इस दवा के बराबर था, जबकि हड्डियों और मांसपेशियों को सुरक्षित रखने में यह तरीका अधिक प्रभावी साबित हुआ।

विशेषज्ञों का मानना है कि रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और Osteoporosis जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में टाइम-रिस्ट्रिक्टेड फीडिंग एक आसान, सस्ता और प्रभावी विकल्प बनकर उभर सकता है, जिसे बिना दवाओं के भी अपनाया जा सकता है।

टीआरएफ का सिद्धांत काफी सरल है। इसमें व्यक्ति दिन के केवल 8 से 10 घंटे के भीतर ही भोजन करता है और बाकी समय उपवास रखता है। उदाहरण के तौर पर सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे के बीच खाना और उसके बाद कुछ न लेना। विशेषज्ञों के अनुसार, जब भोजन दिन के सक्रिय समय में किया जाता है तो शरीर शुगर का बेहतर उपयोग करता है, जिससे मेटाबॉलिज्म सुधरता है और हार्मोनल संतुलन बना रहता है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि अब इस पद्धति का मानव ट्रायल भी शुरू किया जाएगा। इसके तहत जैन समाज के लगभग 300 लोगों को शामिल किया जाएगा, जहां दिन में भोजन करने और सूर्यास्त के बाद भोजन करने वाले समूहों की तुलना की जाएगी। इस अध्ययन के नतीजे अगले 24 महीनों में सामने आने की उम्मीद है, जो भविष्य में स्वास्थ्य सुधार के नए रास्ते खोल सकते हैं।

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संवाददाता

Priyanka Singh

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