Mathura : मथुरा में शंकराचार्य स्वामी अधोक्षजानंद का चतुर्मास व्रत संपन्न, वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई पूर्णाहुति

Mathura : मथुरा के गोवर्धन स्थित आश्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ के चतुर्मास व्रत का समापन हो गया। इस अवसर पर आश्रम परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूर्णाहुति और हवन यज्ञ का आयोजन किया गया। धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही शंकराचार्य का पारंपरिक सीमा उल्लंघन नियम भी पूरा हो गया। हवन यज्ञ वैदिक रीति रिवाज से संपन्न हुआ जिसमें आचार्यों और बटुकों ने मंत्रोच्चार के साथ आहुतियां दीं। इस दौरान आशीर्वाद लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गणमान्य लोग आश्रम पहुंचे।

एक ही स्थान पर रहकर किया कठोर तप
सनातन परंपरा के अनुसार वर्षा ऋतु के चार महीनों में साधु संत एक ही स्थान पर रहकर जप तप और ध्यान करते हैं। इसी नियम के तहत स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ चतुर्मास के दौरान गोवर्धन स्थित आश्रम में प्रवास कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कड़े नियमों का पालन करते हुए क्षेत्र की सुख समृद्धि और विश्व शांति के लिए कामना की।

क्या होता है सीमा उल्लंघन नियम
सनातन संस्कृति में चतुर्मास व्रत के दौरान संन्यासियों के लिए तय सीमा से बाहर जाना वर्जित होता है। इसे सीमाबद्ध प्रवास कहा जाता है। चतुर्मास पूरा होने के बाद जब संन्यासी पुनः यात्रा और धर्म प्रचार के लिए आश्रम की सीमा से बाहर निकलते हैं तो इसे सीमा उल्लंघन कहा जाता है। पूर्णाहुति हवन के साथ स्वामी अधोक्षजानंद का यह नियम विधिवत संपन्न हो गया।

सनातन परंपरा में चतुर्मास का महत्व
शास्त्रों में चतुर्मास काल को भक्ति संयम और आत्म शुद्धि का सर्वोत्तम समय माना गया है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं इसलिए संन्यासी एक स्थान पर रहकर जप ध्यान और कल्याण के लिए अनुष्ठान करते हैं। चतुर्मास समापन के बाद अब शंकराचार्य देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों की यात्रा पर जाएंगे।

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