Kanwar Yatra: बम-बम भोले की गूंज से भगवामय होंगी शहर की सड़कें
नोएडा। सावन के साथ ही नोएडा की सड़कें जल्द ही भगवा रंग में रंगती नजर आएंगी। बम-बम भोले के जयकारों के बीच शिवभक्त हरिद्वार और अन्य तीर्थस्थलों से पवित्र गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्र के शिवालयों की ओर रवाना होंगे। आस्था, विश्वास और कठिन तपस्या से जुड़ी कांवड़ यात्रा में इस बार भी अलग-अलग प्रकार की कांवड़ लेकर श्रद्धालु शामिल होंगे। हर कांवड़ की अपनी धार्मिक मान्यता, परंपरा और नियम हैं, जिनका पालन श्रद्धालु पूरे संकल्प के साथ करते हैं।
कांवड़ यात्रा अब किसी खास आयु वर्ग तक सीमित नहीं रह गई है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस धार्मिक यात्रा में शामिल होते हैं। यही वजह है कि सड़कों पर सबसे ज्यादा साधारण कांवड़ नजर आती है। श्रद्धालु हरिद्वार अथवा अन्य तीर्थस्थलों से गंगाजल भरकर पैदल अपने क्षेत्र के शिवालयों तक पहुंचते हैं। साधारण कांवड़ की यात्रा के दौरान जरूरत पड़ने पर श्रद्धालु निर्धारित स्थानों पर रुककर विश्राम भी कर सकते हैं।
पैदल से दंडवत तक, कांवड़ यात्रा में आस्था के अलग-अलग रूप
सेक्टर-14ए स्थित शनि मंदिर के पुजारी अशोक के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में साधारण कांवड़ लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। वहीं सेक्टर-53 स्थित प्राचीन शिव मंदिर के पुजारी शिवम ने बताया कि हर कांवड़ के साथ अलग धार्मिक नियम और संकल्प जुड़ा होता है।
उन्होंने बताया कि पहले डाक कांवड़ को लेकर श्रद्धालुओं में अधिक उत्साह दिखाई देता था, लेकिन अब परिवारों, युवाओं और पहली बार कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ी है। ऐसे श्रद्धालु साधारण कांवड़ लेकर यात्रा कर रहे हैं। इस बार नोएडा की सड़कों पर पैदल कांवड़ से लेकर दंडवत कांवड़ तक आस्था के अलग-अलग रूप देखने को मिलेंगे।
बिना रुके पूरी करनी होती है डाक कांवड़
डाक कांवड़ को कांवड़ यात्रा के कठिन स्वरूपों में गिना जाता है। गंगाजल लेने के बाद श्रद्धालु बिना रुके दौड़ते या तेज गति से चलते हुए निर्धारित समय के भीतर शिवालय तक पहुंचते हैं। इस दौरान कांवड़ को रास्ते में जमीन पर नहीं रखा जाता। डाक कांवड़ की विशेष प्रकृति को देखते हुए प्रशासन की ओर से कई स्थानों पर अलग यातायात व्यवस्था भी की जाती है।
यात्रा के दौरान जमीन पर नहीं रखी जाती खड़ी कांवड़
खड़ी कांवड़ विशेष अनुशासन और संकल्प का प्रतीक मानी जाती है। इस यात्रा में कांवड़ को पूरे रास्ते जमीन पर नहीं रखा जाता। विश्राम के दौरान भी कांवड़ को स्टैंड या किसी अन्य कांवड़िये के सहारे खड़ा रखा जाता है। श्रद्धालु पूरी यात्रा में इससे जुड़े धार्मिक नियमों और संयम का पालन करते हैं।
दंडवत करते हुए पूरी होती है दांडी कांवड़
दांडी कांवड़ लेकर चलने वाले श्रद्धालुओं की संख्या आमतौर पर दूसरी कांवड़ की तुलना में कम रहती है। इस यात्रा में श्रद्धालु प्रत्येक दंडवत प्रणाम के बाद उसी स्थान से अगला दंडवत करते हुए आगे बढ़ते हैं। कठिन प्रक्रिया के कारण यात्रा पूरी करने में कई दिन और कई बार सप्ताह तक लग जाते हैं। इसे भगवान शिव के प्रति गहरे समर्पण और तपस्या का प्रतीक माना जाता है।
बैकुंठ कांवड़ में संयम और कठोर नियम
पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित कुछ क्षेत्रों में बैकुंठ कांवड़ की भी धार्मिक मान्यता है। इस यात्रा में कांवड़िये विशेष व्रत, शुद्धता और धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी परंपराओं में कुछ अंतर देखने को मिलता है, लेकिन सामान्य तौर पर इसे कठिन संकल्प और संयम से जुड़ी कांवड़ यात्रा माना जाता है।

