Asiatic Lion Deaths: गुजरात में एक साल में बीमारियों से 62 शेर-शेरनी और शावकों की मौत, किडनी फेलियर से निमोनिया तक बने वजह
गांधीनगर। गुजरात में एशियाई शेरों की मौत को लेकर चिंताजनक आंकड़ा सामने आया है। राज्य सरकार के मुताबिक बीते एक साल में विभिन्न बीमारियों से कुल 62 शेर, शेरनी और शावकों की जान गई है, जिनमें 17 नर शेर, 17 शेरनियां और 28 शावक शामिल हैं। मौत की वजहों में सेप्टीसीमिया, निमोनिया, हेमोरेजिक निमोनिया, एनीमिया, किडनी फेलियर, मल्टी-ऑर्गन फेलियर, हार्ट अटैक और लकवा जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं बताई गई हैं।
गुजरात के वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने शुक्रवार को विधानसभा में यह जानकारी दी। वरिष्ठ कांग्रेस विधायक शैलेश परमार के सवाल के जवाब में उन्होंने शेरों की मौत से जुड़े लिखित आंकड़े पेश किए।
सरकार के मुताबिक यह आंकड़ा 31 जुलाई 2026 को खत्म हुए एक साल की अवधि का है, जिसमें बीमारी के चलते 62 एशियाई शेरों की मौत दर्ज हुई।
मरने वालों में 17 नर शेर और 17 शेरनियां शामिल थीं, जबकि सबसे ज्यादा मौतें शावकों की हुईं — एक साल में 28 शावकों ने विभिन्न बीमारियों के चलते दम तोड़ा। इतनी बड़ी संख्या में शावकों की मौत ने एशियाई शेरों की स्वास्थ्य निगरानी और संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों को फिर चर्चा में ला दिया है।
सरकार के मुताबिक इन मौतों के पीछे कोई एक बीमारी जिम्मेदार नहीं रही, बल्कि अलग-अलग शेरों में अलग-अलग गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं सामने आईं। इनमें सेप्टीसीमिया — शरीर में गंभीर संक्रमण की स्थिति — भी शामिल है, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा हो सकती है।
कई मामलों में निमोनिया और हेमोरेजिक निमोनिया जैसी फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां भी मौत का कारण बनीं। कुछ शेरों की मौत एनीमिया, तो कुछ की लिवर-किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं और किडनी फेलियर के चलते हुई।
मल्टी-ऑर्गन डिसफंक्शन और मल्टी-ऑर्गन फेलियर जैसी स्थितियां भी कुछ मामलों में जिम्मेदार रहीं, जहां शरीर के कई अंग एक साथ काम करना बंद कर देते हैं। इसके अलावा मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (हार्ट अटैक) और लकवा भी कुछ शेरों की मौत की वजह बने।
एक साल में 62 शेरों की बीमारी से मौत के बाद संक्रमण रोकने और समय पर इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था अहम मुद्दा बन गई है। राज्य सरकार का कहना है कि इस दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं।
एशियाई शेर गुजरात की वन्यजीव पहचान का अहम हिस्सा हैं, जिनकी प्राकृतिक आबादी मुख्य रूप से गिर और आसपास के इलाकों में पाई जाती है। शेरों की संख्या और क्षेत्र बढ़ने के साथ वन विभाग पर उनकी स्वास्थ्य निगरानी की जिम्मेदारी भी बढ़ी है, खासकर शावकों की सेहत पर लगातार नजर रखना जरूरी माना जाता है क्योंकि कम उम्र में संक्रमण का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है — यही वजह है कि 62 मौतों में 28 शावकों का शामिल होना खास तौर पर अहम माना जा रहा है।
सरकार ने भरोसा दिलाया है कि संक्रमण रोकने और समय पर उपचार सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। वन्यजीव संरक्षण में केवल शिकार या मानव-वन्यजीव संघर्ष से सुरक्षा ही चुनौती नहीं, बल्कि संक्रामक रोग और अंगों से जुड़ी बीमारियां भी शेरों की आबादी के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। इसीलिए नियमित स्वास्थ्य जांच, बीमारी की शुरुआती पहचान और समय पर चिकित्सा सहायता को अहम माना जा रहा है।
शेरों के आवास क्षेत्र का दायरा बढ़ने के साथ स्वास्थ्य निगरानी का काम भी बड़ा होता जा रहा है, जिसके लिए वन विभाग को अलग-अलग इलाकों में शेरों की गतिविधियों और सेहत पर नजर बनाए रखनी होगी।
विधानसभा में सामने आए इन आंकड़ों ने एशियाई शेरों के संरक्षण के साथ उनकी चिकित्सा व्यवस्था पर भी ध्यान केंद्रित किया है। 31 जुलाई 2026 तक के एक साल में हुई 62 मौतों — 17 नर शेर, 17 शेरनी और 28 शावक — के पीछे सेप्टीसीमिया, निमोनिया, एनीमिया, किडनी फेलियर, मल्टी-ऑर्गन फेलियर, हार्ट अटैक और लकवा जैसी बीमारियां जिम्मेदार बताई गई हैं।
गुजरात सरकार ने विधानसभा में भरोसा दिलाया है कि संक्रमण रोकथाम और समय पर चिकित्सा सुविधा को लेकर कदम उठाए जा रहे हैं। आने वाले समय में इन प्रयासों की सफलता ही तय करेगी कि एशियाई शेरों के संरक्षण और बीमारी से होने वाली मौतों में कमी कैसे लाई जाती है।


