Mathura : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के समापन अवसर पर ब्रज प्रांत के स्वयंसेवकों ने घोष के विविध वाद्य यंत्रों के साथ गिरिराज महाराज की परिक्रमा कर अपनी श्रद्धा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के संकल्प का परिचय दिया। घोष की मधुर स्वर लहरियों से परिक्रमा मार्ग गुंजायमान हो उठा। स्वयंसेवकों ने अपनी कला और वादन कौशल का प्रदर्शन करते हुए गिरिराज महाराज के चरणों में नमन किया और समाज सेवा के पथ पर निरंतर आगे बढ़ने का आशीर्वाद लिया। कार्यक्रम में 350 से अधिक स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
परिक्रमा के समापन पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए ब्रज प्रांत प्रचारक धर्मेंद्र ने कहा कि संघ का स्वयंसेवक विषम से विषम परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और अनुशासन के साथ आगे बढ़ने का मार्ग बनाता है। गिरिराज महाराज की परिक्रमा करना अपने आप में श्रद्धा और संकल्प का विषय है, लेकिन वाद्य यंत्रों के साथ निरंतर घोष वादन करते हुए परिक्रमा पूर्ण करना शारीरिक क्षमता, मानसिक दृढ़ता और सामूहिक अनुशासन की कठिन परीक्षा है। ऐसे कार्यक्रम स्वयंसेवकों के भीतर चुनौतियों का सामना करने और कठिन परिस्थितियों में अविचल रहने की प्रेरणा जगाते हैं।
संघ के विभाग प्रचार प्रमुख डॉ. कमल कौशिक ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों की यात्रा संघर्ष, साधना और राष्ट्रसेवा की यात्रा रही है। संघ ने अपने कार्यों के माध्यम से समाज में राष्ट्रभाव, अनुशासन, सेवा और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का काम किया है। आज देशभर में लाखों स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक कार्यों और राष्ट्रहित से जुड़े दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। भारत को विकसित और सशक्त राष्ट्र बनाने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता जरूरी है।
प्रांत के शारीरिक शिक्षण प्रमुख महावीर ने बताया कि संघ पिछले एक वर्ष से शताब्दी वर्ष के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर रहा था। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य स्वयंसेवकों की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ समाज जागरण, सामाजिक समरसता और विभिन्न वर्गों के बीच आत्मीयता को मजबूत करना था। इसी क्रम में शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की सफल पूर्णता पर कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ब्रज की पावन धरा पर घोष के साथ गिरिराज परिक्रमा का आयोजन किया गया।
श्रीजी की हवेली के निकट परिक्रमा मार्ग पर रमाकांत गोस्वामी ने कहा कि शरद पूर्णिमा भारतीय धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। ऐसे पावन अवसर पर घोष वादन के साथ परिक्रमा करना श्रद्धा और संस्कृति का अनूठा संगम है। वाद्य यंत्रों पर प्रस्तुत घोष रचनाओं ने परिक्रमा के वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
महानगर कार्यवाह विजय बंटा ने बताया कि जिस प्रकार सेना और पुलिस में बैंड की परंपरा होती है उसी प्रकार संघ में वाद्य यंत्रों के सामूहिक और अनुशासित वादन को घोष कहा जाता है। घोष की रचनाएं स्वयंसेवकों में अनुशासन, सामूहिकता और उत्साह का संचार करती हैं। कार्यक्रम की व्यवस्था विभाग प्रचारक पारस ने संभाली। स्वयंसेवकों की व्यवस्था मुरारी वाली कुंज विद्या मंदिर में की गई थी। दानघाटी से प्रारंभ हुआ घोष संचलन निर्धारित मार्ग से होते हुए परिक्रमा के साथ संपन्न हुआ।
इस अवसर पर क्षेत्र शारीरिक शिक्षण प्रमुख नरेश विकल, सह प्रांत प्रचारक विनोद, घोष प्रमुख ललित, प्रांत शारीरिक सह प्रमुख रामशंकर, विभाग कार्यवाह डॉ. संजय, जिला प्रचारक कुश चाहर, जिला प्रचार प्रमुख हीरालाल सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे।





