Maryland : लोकतंत्र अंधविश्वास के सहारे जीवित नहीं रह सकता

Maryland : केवल समय पर चुनाव होने से कोई लोकतंत्र मजबूत नहीं बन जाता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिकों को विश्वास हो कि संस्थाएं निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र ढंग से काम कर रही हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा संस्थाओं की आलोचना नहीं, बल्कि उन पर जनता के भरोसे का धीरे-धीरे कमजोर होना है।

इतिहास गवाह है कि सत्ता में बैठे लोग अक्सर जवाबदेही से अधिक सुविधा को प्राथमिकता देते रहे हैं। हर राजनीतिक विचारधारा की सरकार जनता की स्वीकृति चाहती है, लेकिन लोकतंत्र लोकप्रियता से कहीं अधिक की मांग करता है। वह जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करता है। सबसे बढ़कर, वह यह सुनिश्चित करने की मांग करता है कि कोई संस्था, नेता या राजनीतिक दल सवालों से ऊपर न हो।

पुरानी कहावत है कि सत्य को हमेशा के लिए छिपाया नहीं जा सकता। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और चौबीसों घंटे चलने वाले समाचारों के इस दौर में सूचना पहले से कहीं अधिक तेजी से फैलती है। विडंबना यह है कि भ्रम भी बढ़ा है। नागरिकों के सामने परस्पर विरोधी दावे, चुनिंदा तथ्य और जनमत को प्रभावित करने के लिए तैयार किए गए राजनीतिक संदेश लगातार आते रहते हैं। ऐसे माहौल में सत्य की खोज केवल वांछनीय नहीं, आवश्यक हो जाती है।

लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक तथ्य और दुष्प्रचार के बीच, तथा जवाबदेही और राजनीतिक दिखावे के बीच अंतर कर सकें। जब सार्वजनिक बहस विवेकपूर्ण निर्णय के बजाय अंधनिष्ठा से संचालित होने लगे, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचता है। कोई राष्ट्र तब आगे नहीं बढ़ सकता जब आलोचना को विश्वासघात माना जाए या कठिन सवालों को राजनीतिक शत्रुता बताकर खारिज कर दिया जाए।

इस बहस में मीडिया की केंद्रीय भूमिका है। पत्रकारिता का उद्देश्य कभी जनसंपर्क करना नहीं था। उसका काम सत्ता से सवाल पूछना, गलत कामों की जांच करना और बिना भय या पक्षपात के तथ्य सामने रखना है। जब पत्रकारिता राजनीतिक या व्यावसायिक हितों पर अत्यधिक निर्भर हो जाती है, तो जनता का भरोसा घटने लगता है। इसके बाद नागरिक सूचना के वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाते हैं, जिनमें से कई स्वयं भी विश्वसनीय नहीं होते। परिणामस्वरूप अविश्वास का ऐसा वातावरण बनता है जो लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।

लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की रक्षा करने वाली संस्थाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। उनकी विश्वसनीयता केवल आधिकारिक बयानों से नहीं, बल्कि आम नागरिकों के मन में पैदा होने वाले विश्वास से मापी जाती है। जनता से भरोसा मांगा नहीं जा सकता; उसे निरंतर पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के माध्यम से अर्जित करना पड़ता है। जब भी संदेह उठें, संस्थाओं को उन्हें खारिज करने के बजाय खुले तौर पर संबोधित करना चाहिए। पारदर्शिता कमजोरी नहीं, मजबूती का संकेत है।

न्यायपालिका पर भी विशेष जिम्मेदारी है। नागरिक अक्सर अदालतों को संवैधानिक मूल्यों और व्यक्तिगत अधिकारों के अंतिम संरक्षक के रूप में देखते हैं। न्यायिक व्यवस्था की शक्ति केवल उसके कानूनी अधिकार में नहीं, बल्कि इस जनविश्वास में भी निहित है कि उसके फैसले राजनीतिक विचारों के बजाय कानून पर आधारित हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की स्थिरता के लिए इस विश्वास को बनाए रखना आवश्यक है।

आधुनिक राजनीति की एक और चिंताजनक प्रवृत्ति नागरिकों को विरोधी खेमों में बांटना है। राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन दूसरे नागरिकों के प्रति शत्रुता स्वाभाविक नहीं है। लोकतंत्र तब फलता-फूलता है जब लोग जोरदार बहस करते हुए भी एक-दूसरे के अलग विचार रखने के अधिकार का सम्मान करते हैं। जब राजनीतिक पहचान सत्य से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।

नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी भी समझनी होगी। लोकतंत्र दर्शक बनकर देखने की व्यवस्था नहीं है। इसके लिए भागीदारी, सतर्कता और जानकारी के आधार पर सक्रिय भूमिका आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सवाल पूछे, तथ्यों की पुष्टि करे और स्वतंत्र रूप से सोचे। किसी भी नेता, दल, संस्था या विचारधारा में अंधविश्वास लोकतांत्रिक नागरिकता के अनुरूप नहीं है। राष्ट्र तब प्रगति करता है जब नागरिक प्रश्न पूछते हैं, उत्तर मांगते हैं और दलगत निष्ठाओं के बजाय संवैधानिक सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं।

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा उल्लेखनीय रही है, लेकिन कोई भी लोकतंत्र आत्मसंतोष का जोखिम नहीं उठा सकता। संस्थाओं को लगातार अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी। सरकारों को जांच और आलोचना का स्वागत करना चाहिए। विपक्षी दलों को केवल अवरोध पैदा करने के बजाय रचनात्मक विकल्प देने चाहिए। मीडिया को सनसनी के बजाय तथ्यों का अनुसरण करना चाहिए। नागरिकों को राजनीतिक सुविधा से ऊपर सत्य को रखना होगा।

गणराज्य का भविष्य केवल नारों, व्यक्तित्वों या चुनावी जीत से सुरक्षित नहीं होगा। उसे ऐसी संस्थाएं सुरक्षित करेंगी जो सम्मान अर्जित करें, ऐसे नेता जो जवाबदेही स्वीकार करें, और ऐसे नागरिक जो अपना स्वतंत्र विवेक न छोड़ें।

निष्कर्ष

लोकतंत्र इसलिए जीवित नहीं रहता कि लोग आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। वह इसलिए जीवित रहता है क्योंकि संस्थाएं भरोसे के योग्य बनी रहती हैं। लोकतांत्रिक शक्ति की वास्तविक कसौटी समाज की वह इच्छा है जिसके तहत वह सत्ता से सवाल पूछे, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करे और सार्वजनिक जिम्मेदारी निभाने वाले प्रत्येक व्यक्ति से जवाबदेही की मांग करे।

आगे की राह

भारत को संस्थागत पारदर्शिता मजबूत करने, स्वतंत्र पत्रकारिता को अधिक संरक्षण देने, नागरिक शिक्षा का विस्तार करने, अधिक सूचित सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देने और संवैधानिक सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने की आवश्यकता है। केवल प्रचार के बल पर जनता का विश्वास पैदा नहीं किया जा सकता। उसे कामकाज, ईमानदारी और खुलेपन से अर्जित करना पड़ता है। भविष्य उनका नहीं है जो बिना सवाल किए निष्ठा की मांग करते हैं, बल्कि उनका है जो जांच का स्वागत करते हैं और जनता के प्रति जवाबदेह रहते हैं।

चौधरी प्रताप सिंह
अध्यक्ष, ओआईसी, मैरीलैंड, अमेरिका

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