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“द्वारकाधीश की प्रतीक्षा” : द्वारका, सभ्यता और न्यायपूर्ण समाज की प्रतीक्षा में खड़े भगवान श्रीकृष्ण

डॉ. अनिल सिंह, एडिटर, STAR Views एवं एडिटोरियल एडवाइज़र, Top Story, पूर्व Executive Editor, Aaj Tak, ABP News एवं STAR News

New Delhi Desk : अरब सागर के तट पर स्थित द्वारका केवल एक धार्मिक तीर्थ नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह उस प्राचीन संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है जिसने युद्ध, कूटनीति, न्याय, शासन, आध्यात्म और मानवता को जीवन के परस्पर जुड़े आयामों के रूप में समझा। पिछले रविवार जब मैं भगवान द्वारकाधीश के दर्शन और पूजा के लिए द्वारका पहुँचा, तब यह यात्रा केवल एक आध्यात्मिक अनुभव नहीं रही, बल्कि इतिहास, राजनीति और राज्यशास्त्र के नैतिक आधारों के साथ एक गहन संवाद बन गई। शायद यही कारण है कि जब भी मुझे दिल्ली से सौराष्ट्र आने का अवसर मिलता है, मैं अनायास ही द्वारका की ओर खिंचा चला आता हूँ। इस पवित्र नगरी में एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो सामान्य भक्ति से कहीं अधिक गहरी अनुभूति कराती है।

द्वारका की संकरी गलियों में चलते हुए ऐसा महसूस होता है मानो समय स्वयं ठहर गया हो। मंदिरों की घंटियों की ध्वनि समुद्र की लहरों के साथ मिलकर उस स्वर्णिम नगरी की कथा सुनाती प्रतीत होती है जिसे हजारों वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। हिन्दू ग्रंथों के अनुसार मथुरा छोड़ने के बाद भगवान कृष्ण ने भारत के पश्चिमी तट पर द्वारका की स्थापना की थी। यह केवल एक नगर नहीं था, बल्कि अपने समय की सबसे उन्नत समुद्री सभ्यताओं में से एक था, जो रणनीतिक रूप से समुद्र के किनारे स्थापित था। द्वारका सुरक्षा, समृद्धि, कूटनीति और संगठित शासन व्यवस्था का प्रतीक थी।

राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भगवान श्रीकृष्ण भारतीय सभ्यता के सबसे महान राज्यशास्त्री थे। वे जानते थे कि केवल शक्ति के बल पर स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती। संवाद, मध्यस्थता, समय की समझ और संतुलित रणनीति शासन के उतने ही महत्वपूर्ण तत्व हैं। महाभारत के दौरान श्रीकृष्ण ने बार-बार युद्ध टालने के लिए संवाद का मार्ग अपनाया। वे हस्तिनापुर शांति दूत बनकर गए और संघर्ष शुरू होने से पहले समझौते एवं समन्वय का प्रस्ताव रखा। कूटनीति का यह दृष्टिकोण राजनीतिक दर्शन में श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा योगदान माना जा सकता है।

आज जब विश्व युद्धों, आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य गठबंधनों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में उलझा हुआ है, तब श्रीकृष्ण की मध्यस्थता आधारित राजनीति पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। भारत अक्सर “विश्वगुरु” बनने की बात करता है, लेकिन वास्तविक नेतृत्व केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति से नहीं आता। उसके लिए नैतिक अधिकार और संतुलित बुद्धिमत्ता के साथ संघर्षों को सुलझाने की क्षमता भी आवश्यक होती है। श्रीकृष्ण की कूटनीति प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि न्याय पर आधारित थी। यही वह शिक्षा है जिसे आधुनिक भारत और पूरी दुनिया को पुनः समझने की आवश्यकता है।

द्वारका से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य उसका समुद्र में समा जाना है। पिछले कई दशकों में वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने आधुनिक द्वारका के तट के समीप समुद्र के भीतर अनेक संरचनाओं के प्रमाण खोजे हैं। समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों को पत्थर की दीवारें, प्राचीन लंगर, बस्तियों के अवशेष और बंदरगाह जैसी संरचनाएँ मिली हैं। इन खोजों ने इस धारणा को बल दिया कि द्वारका केवल पौराणिक कल्पना नहीं थी, बल्कि उसका वास्तविक ऐतिहासिक और शहरी अस्तित्व था। अनेक वैज्ञानिक मानते हैं कि समुद्र के स्तर में परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह प्राचीन नगर धीरे-धीरे जलमग्न हो गया।

किन्तु भारतीय सभ्यता इस घटना को केवल वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं, बल्कि दार्शनिक रूप से भी देखती है। हिन्दू ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि यादव वंश के विनाश और गांधारी के श्राप के बाद समुद्र ने द्वारका को निगल लिया। चाहे इसे मिथक माना जाए या प्रतीक, इसका संदेश अत्यंत गहरा है—अहंकार, हिंसा और नैतिक पतन अंततः सबसे शक्तिशाली सभ्यताओं को भी नष्ट कर देते हैं। आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएँ भी इस चेतावनी से बहुत कुछ सीख सकती हैं। इतिहास बार-बार सिद्ध करता है कि नैतिकता से अलग हुई सत्ता अंततः अपने ही बोझ तले ढह जाती है।

आज द्वारकाधीश मंदिर उस खोई हुई सभ्यता का जीवित आध्यात्मिक प्रतीक बनकर खड़ा है। समुद्र के किनारे ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर, जिसकी पताका निरंतर लहराती रहती है, मानो मानवता के नैतिक संघर्षों का शाश्वत साक्षी हो। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ केवल आशीर्वाद लेने नहीं आते, बल्कि उस सभ्यतागत स्मृति से जुड़ने आते हैं जिसने भारत की पहचान को आकार दिया है।

द्वारका की सबसे अद्भुत विशेषताओं में से एक है—आस्था और विज्ञान का सहअस्तित्व। दुनिया के अनेक हिस्सों में मिथक और इतिहास को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता है, लेकिन भारत में आध्यात्मिक आख्यान और ऐतिहासिक चेतना अक्सर एक-दूसरे के साथ बहते हैं। द्वारका इसी भारतीय समन्वय का प्रतिनिधित्व करती है। पुरातत्व समुद्र के भीतर डूबी दीवारों को खोज सकता है, लेकिन उन पत्थरों को जीवंत अर्थ श्रद्धा ही प्रदान करती है।

भगवान श्रीकृष्ण की प्रासंगिकता केवल धर्म तक सीमित नहीं है। वे एक रणनीतिकार, दार्शनिक, कूटनीतिज्ञ और समाज सुधारक भी थे। स्वयं सम्राट बने बिना उन्होंने अनेक राज्यों की दिशा निर्धारित की। वे युद्ध की मनोविज्ञान, शक्ति की सीमाओं और नैतिक शासन की आवश्यकता को भलीभांति समझते थे। आज आधुनिक लोकतंत्र गठबंधन राजनीति, रणनीतिक साझेदारी और शक्ति संतुलन की बात करते हैं, जबकि श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले इन सिद्धांतों को अद्भुत परिपक्वता के साथ व्यवहार में उतारा था।

भारत की समकालीन विदेश नीति भी श्रीकृष्ण के राज्यशास्त्र से गहरी प्रेरणा ले सकती है। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का तनाव हो या विश्व शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा—भारत की वास्तविक ताकत संतुलित कूटनीति में निहित है। श्रीकृष्ण का दर्शन सिखाता है कि वास्तविक शक्ति केवल आक्रामकता में नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा करते हुए संतुलन बनाए रखने में होती है।

दूसरी ओर, द्वारका भारत की सांस्कृतिक विरासत संरक्षण की नीति पर भी एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और सोमनाथ मंदिर के पुनर्विकास ने यह सिद्ध किया है कि विरासत संरक्षण आधुनिक आधारभूत संरचना के साथ-साथ चल सकता है। लेकिन द्वारका अब भी एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि की प्रतीक्षा कर रही है।

सरकार को यह समझना होगा कि द्वारका केवल गुजरात का एक क्षेत्रीय तीर्थस्थल नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत निरंतरता का वैश्विक प्रतीक है। इसे एक अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जो चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बने। विरासत संरक्षण को केवल राजनीतिक प्रतीकवाद तक सीमित नहीं रखा जा सकता; इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत की ऐतिहासिक स्मृति को सुरक्षित रखने का राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा।

द्वारका को आध्यात्मिक पर्यटन, समुद्री पुरातत्व और सभ्यतागत अध्ययन के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएँ हैं। समुद्र के भीतर मौजूद प्राचीन द्वारका के अवशेष दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अंडरवाटर हेरिटेज साइट्स में शामिल हो सकते हैं। यहाँ शोध संस्थान, संग्रहालय, सांस्कृतिक केंद्र और विश्वस्तरीय विरासत गलियारे विकसित किए जाने चाहिए। इससे न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि पर्यटन और शोध के माध्यम से आर्थिक अवसर भी उत्पन्न होंगे।

जब मैं मंदिर के निकट समुद्र के सामने बैठा था, तब मुझे ऐसा लगा मानो द्वारकाधीश आज भी मानवता के अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित बनने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल आते-जाते हैं, विचारधाराएँ बदलती रहती हैं, लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा उठाए गए नैतिक प्रश्न शाश्वत बने रहते हैं। क्या न्याय के बिना शक्ति टिक सकती है? क्या युद्ध कभी स्थायी शांति दे सकता है? क्या नैतिकता के बिना कूटनीति जीवित रह सकती है?

आधुनिक विश्व केवल आर्थिक और सैन्य संकटों से नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व के संकट से भी जूझ रहा है। श्रीकृष्ण ने कभी व्यक्तिगत सत्ता को अंतिम लक्ष्य नहीं बनाया। उन्होंने सिंहासन के मोह में पड़े बिना राज्यों का मार्गदर्शन किया। आज की लोकतांत्रिक राजनीति में ऐसा संयम अत्यंत दुर्लभ होता जा रहा है। राजनीति अब अक्सर वर्चस्व, प्रचार और चुनावी गणित तक सीमित होकर रह गई है। श्रीकृष्ण का दर्शन हमें याद दिलाता है कि शासन का अंतिम उद्देश्य समाज की सेवा होना चाहिए, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं।

यदि भारत वास्तव में अपनी सभ्यतागत चेतना को पुनर्जीवित करना चाहता है, तो उसे केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि श्रीकृष्ण के सिद्धांतों को शासन और कूटनीति में भी आत्मसात करना होगा। मध्यस्थता, रणनीतिक बुद्धिमत्ता, न्याय आधारित राजनीति और नैतिक नेतृत्व के उनके विचार इक्कीसवीं सदी में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने महाभारत काल में थे।

आज द्वारका मौन प्रतीक्षा में खड़ी है—केवल मंदिर विस्तार या पर्यटन परियोजनाओं की नहीं, बल्कि एक अधिक संतुलित और मानवीय समाज के उदय की प्रतीक्षा में। इसलिए द्वारका का पुनर्निर्माण और समग्र विकास चुनावी गणनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनना चाहिए। भारत को यहाँ एक विश्वस्तरीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कॉरिडोर विकसित करना होगा, जिसमें पर्यावरण संरक्षण, समुद्री संतुलन और विरासत सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाए।

द्वारका केवल अतीत की स्मृति नहीं है; यह भविष्य के लिए एक संदेश है। क्योंकि जब नगर समुद्र में डूब जाते हैं, तब सभ्यताएँ केवल अपने मूल्यों के माध्यम से जीवित रहती हैं। और भगवान द्वारकाधीश आज भी अरब सागर के किनारे उन्हीं मूल्यों के शाश्वत संरक्षक बनकर खड़े हैं।

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संवाददाता

SHAHRUKH KHAN

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