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Noida Para Athletics Pride: दृष्टिहीन मुन्ना शाह ने दिल्ली चैंपियनशिप में दो स्वर्ण सहित तीन पदक जीतकर रचा इतिहास

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Noida Para Athletics Pride: दृष्टिहीन मुन्ना शाह ने दिल्ली चैंपियनशिप में दो स्वर्ण सहित तीन पदक जीतकर रचा इतिहास

नोएडा के बरौला निवासी दृष्टिहीन पैरा एथलीट मुन्ना शाह ने दिल्ली पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर शहर और प्रदेश का नाम रोशन किया है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में संपन्न हुई इस प्रतियोगिता में मुन्ना शाह ने पहली बार एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक हासिल किया, जो उनके खेल जीवन की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। उन्होंने डिस्कस थ्रो और शॉटपुट में पहला स्थान प्राप्त कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया, जबकि लंबी कूद में रजत पदक जीतकर अपना दबदबा साबित किया। इस शानदार प्रदर्शन के बाद अब मुन्ना शाह राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में दिल्ली का प्रतिनिधित्व करेंगे। इससे पहले वह एक बार कांस्य पदक जीत चुके थे, लेकिन यह उनका पहला अवसर है जब उन्होंने एथलेटिक्स में दोहरा स्वर्ण जीता है। बैंक ऑफ बड़ौदा में क्लर्क के पद पर कार्यरत मुन्ना शाह पैरा तैराकी में भी एक जाना-पहचाना नाम हैं और दिल्ली तथा राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं। बचपन में उनकी आंखों की रोशनी सामान्य थी, लेकिन 15 वर्ष की उम्र के बाद धीरे-धीरे दृष्टि कमजोर होती गई और समय के साथ वह पूरी तरह दृष्टिहीन हो गए।

चिकित्सकीय जांच के बावजूद उनकी दृष्टि बाधित होने के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल सका। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और खेल को अपना सहारा बनाया। मुन्ना शाह ने बताया कि दिल्ली पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में पहली बार स्वर्ण पदक जीतकर वह बेहद खुश हैं और अब राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन के लिए नियमित अभ्यास पर ध्यान देंगे, जिसके लिए वह मॉडर्न स्कूल में अभ्यास करते रहेंगे। पैरा तैराकी में भी उनका प्रदर्शन लगातार बेहतरीन रहा है और दिल्ली प्रदेश पैरा तैराकी प्रतियोगिताओं में वह हर साल स्वर्ण सहित कई पदक जीतते आ रहे हैं। मूल रूप से बिहार के छपरा जिले के रहने वाले मुन्ना शाह ने गांव के तालाब में तैराकी कर अपने खेल की नींव रखी थी, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

वर्ष 2014 में माता-पिता के निधन और पारिवारिक विवादों के बाद वह घर छोड़कर दिल्ली आए थे, जहां संघर्ष के दिनों में छोटे-मोटे काम किए और फिर पैरा खेल कोटे से बैंक ऑफ बड़ौदा में नौकरी मिली। आज मुन्ना शाह की कहानी न सिर्फ खेल जगत के लिए बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बन चुकी है, जो यह साबित करती है कि मजबूत इरादों के आगे कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।

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संवाददाता

Tirthankar Sarkar

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