Rajasthan: धौलपुर के ग्रामीण बरसात में जान जोखिम में डालकर पार कर रहे नदी, सड़क अब भी सपना

Rajasthan: धौलपुर के ग्रामीण बरसात में जान जोखिम में डालकर पार कर रहे नदी, सड़क अब भी सपना

राजस्थान के धौलपुर जिले में विकास की हकीकत को आइना दिखाता एक दर्दनाक दृश्य सामने आया है। सेंपऊ उपखंड की नुनेहरा ग्राम पंचायत के सैकड़ों ग्रामीण आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। बारिश के मौसम में हालत इतनी खराब हो जाती है कि करीब 2000 से ज्यादा ग्रामीणों को ट्यूब पर चारपाई रखकर नदी पार करनी पड़ती है — वो भी सिर्फ स्कूल या कस्बे तक पहुंचने के लिए। नुनेहरा पंचायत के भूरा का पुरा, बघेलों का पुरा, बरसो, मधेया, पंछी का पुरा और महंत का अड्डा जैसे गांवों को अब तक पक्की सड़क से नहीं जोड़ा जा सका है। इन गांवों के लोग, खासकर छात्र और ग्रामीण महिलाएं, हर दिन जान जोखिम में डालकर बारिश के बीच नदी पार करने को मजबूर हैं।

धौलपुर के तसीमो और सैंपऊ कस्बे से जुड़ने के लिए इन्हें करीब 10 किलोमीटर का चक्कर लगाकर जाना पड़ता है, जबकि सीधी दूरी सिर्फ 2 किलोमीटर है — जो एक नदी के पार है। इसी कारण गांव के लोग नदी पार करने के लिए टायर की ट्यूब पर चारपाई बांधकर उसे अस्थाई नाव के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह न केवल खतरनाक है, बल्कि ग्रामीणों के जीवन को हर दिन संकट में डालने वाला अभ्यास बन चुका है।

ग्रामीणों ने बताया कि बरसात के मौसम में हालात और भी ज्यादा भयावह हो जाते हैं, क्योंकि नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, और पार करना जोखिम भरा हो जाता है। बावजूद इसके, स्कूली बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग यही रास्ता अपनाते हैं क्योंकि कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने बार-बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सड़क निर्माण की मांग की, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बच्चों की पढ़ाई, मरीजों का इलाज और रोज़मर्रा की जरूरतें सब कुछ इस नदी पार करने पर टिका है।

सरकार भले ही गांव-गांव सड़क पहुंचाने के दावे करती हो, लेकिन धौलपुर की यह तस्वीर बताती है कि विकास का सपना अब भी हजारों लोगों के लिए अधूरा है। ग्रामीणों ने सरकार से अपील की है कि जल्द से जल्द इस मार्ग पर पक्की सड़क का निर्माण करवाया जाए ताकि उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी सामान्य हो सके और बच्चों की शिक्षा बाधित न हो। धौलपुर के इस दर्दनाक हालात ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बुनियादी सुविधाओं के बिना “विकसित भारत” की कल्पना की जा सकती है?

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