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Noida Holi Tradition: चौपालों पर एक माह पहले से गूंजती थी फाग और रसिया, अब बदल गया त्योहार का स्वरूप

Noida Holi Tradition: चौपालों पर एक माह पहले से गूंजती थी फाग और रसिया, अब बदल गया त्योहार का स्वरूप

नोएडा। समय के साथ त्योहारों की तस्वीर भी बदलती चली गई है। आधुनिक जीवनशैली और बाजारीकरण का असर रंगों के पर्व होली पर भी साफ दिखाई देता है। एक दौर था जब होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे एक महीने तक चलने वाला सामाजिक और सांस्कृतिक पर्व हुआ करता था। गांवों की चौपालों पर फाल्गुन मास की शुरुआत होते ही फाग और रसिया की गूंज सुनाई देने लगती थी, जो देर रात तक माहौल को जीवंत बनाए रखती थी।

बोड़ाकी गांव के 82 वर्षीय बुजुर्ग मास्टर परशुराम बताते हैं कि वसंत पंचमी के साथ ही होली की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। फाल्गुन लगते ही गांवों में उल्लास का वातावरण बन जाता था। शाम ढलते ही चौपालों पर ढोलक, मंजीरे और झांझ की थाप के साथ फाग गाए जाते थे। पुरुष और महिलाएं अलग-अलग टोलियां बनाकर पूरे गांव में घूमते, पारंपरिक गीत गाते और आपसी भाईचारे को मजबूत करते थे।

उनके अनुसार, उस समय होली का अर्थ केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम थी। चौपालों पर बुजुर्गों की महफिल सजती थी, जहां लोकगीतों और रसिया की स्वर लहरियां गूंजती थीं। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी इसमें भाग लेते थे। गांव-गांव में नगाड़ा प्रतियोगिताएं होती थीं, जिनमें अलग-अलग टीमें अपनी कला का प्रदर्शन करती थीं।

आज भी ग्रेटर नोएडा के जुनैदपुर, रूपवास, बिसरख और पल्ला जैसे कुछ गांवों में यह परंपरा जीवित है। पल्ला गांव के दीपक भाटी बताते हैं कि उन्होंने इस बार होली के लिए विशेष रूप से नया नगाड़ा खरीदा है और गांव में नगाड़ा प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। उनका कहना है कि भले ही समय बदल गया हो, लेकिन गांव की सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखने का प्रयास जारी है।

जुनैदपुर गांव के बुजुर्ग मुन्नी भगत याद करते हैं कि पहले होली के रंग भी प्रकृति से ही तैयार किए जाते थे। टेसू के फूलों को सुखाकर या उबालकर केसरिया रंग बनाया जाता था। हल्दी और आटे से गुलाल तैयार किया जाता था। इन प्राकृतिक रंगों में न तो किसी तरह का रसायन होता था और न ही त्वचा को नुकसान पहुंचने का डर। बच्चे और युवा कई दिन पहले से लकड़ियां और उपले इकट्ठा करते थे, ताकि होलिका दहन पूरे गांव का सामूहिक आयोजन बन सके।

होलिका दहन से पहले ढोल-नगाड़ों के साथ पूरे गांव में भ्रमण किया जाता था। लोग एक-दूसरे के घर जाकर आमंत्रण देते थे और सामूहिक रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होलिका दहन करते थे। उस दौर में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि परंपरा, लोकसंस्कृति और सामूहिक एकता का प्रतीक थी।

हालांकि आज शहरीकरण और व्यस्त जीवनशैली के कारण वह माहौल कम होता जा रहा है, लेकिन कुछ गांवों में अब भी चौपालों पर फाग और रसिया की परंपरा कायम है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है।

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संवाददाता

Tirthankar Sarkar

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