FICCI FRAMES 2026 : कंटेंट की प्रचुरता से रचनात्मक शक्ति और वैश्विक प्रभाव की ओर बढ़ता भारतीय मीडिया

FICCI FRAMES 2026 : शहर के मध्य स्थित ग्रैंड हयात आज तेजी से बदलते भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग के विमर्श का केंद्र बन गया। FICCI FRAMES के 26वें संस्करण में नीति-निर्माता, मीडिया जगत के दिग्गज, फिल्म निर्माता, डिजिटल एवं फिल्म पेशेवर, तकनीशियन और उद्यमी एक मंच पर जुटे। सम्मेलन का केंद्रीय विमर्श इस बात पर रहा कि तकनीक किस तरह कहानी कहने के स्थापित तौर-तरीकों और मीडिया उद्योग के पुराने नियमों को नए सिरे से लिख रही है। ऐसे समय में जब दर्शकों के पास विकल्पों की कोई कमी नहीं है और कहानी कहने के साधन लगातार बदल रहे हैं, सम्मेलन में उद्योग के भीतर इस परिवर्तन को लेकर उत्साह साफ दिखाई दिया।

सम्मेलन की थीम—‘India’s Media Moment: Creating Value in an Age of Infinite Content’—टेलीविजन, सिनेमा, स्ट्रीमिंग, खेल, गेमिंग, लाइव एंटरटेनमेंट और क्रिएटर इकोनॉमी में हो रहे व्यापक बदलाव को सटीक रूप से अभिव्यक्त करती है। यहां हुई चर्चाओं से यह स्पष्ट हुआ कि इन अलग-अलग क्षेत्रों के बीच की सीमाएं तेजी से धुंधली हो रही हैं। फिल्म उद्योग डिजिटल मीडिया के साथ जुड़ रहा है, खेल एक अत्याधुनिक डिजिटल मनोरंजन उद्योग का रूप ले रहा है, गेमिंग कहानी कहने का नया माध्यम बन रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंटेंट निर्माण से लेकर उसके वितरण तक व्यापक प्रभाव डाल रहा है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने नए मीडिया युग में भारत की सांस्कृतिक विरासत के महत्व को प्रमुखता से रेखांकित किया। उनका संदेश उस उद्योग के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, जिसका ध्यान आमतौर पर तकनीक, प्लेटफॉर्म और दर्शकों की संख्या पर केंद्रित रहता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की असली ताकत केवल उसके विशाल बाजार में नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता, सांस्कृतिक विविधता और कहानी कहने की समृद्ध परंपरा में निहित है।

पूरे सत्र में ‘कंटेंट’ और ‘कॉन्टेक्स्ट’ के बीच का अंतर एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में सामने आया। भारत के पास इतिहास, संस्कृति, लोक परंपराओं, लोककला, संगीत, प्रदर्शन कलाओं, स्मारकों और क्षेत्रीय पहचानों की ऐसी समृद्ध विरासत है, जो सदियों से विकसित हुई है। अब चुनौती यह है कि इस विरासत को ऐसे आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया जाए कि वह अपनी मौलिकता और प्रामाणिकता खोए बिना पूरी दुनिया तक पहुंच सके।

शेखावत ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि भारत में कहानी कहने की परंपरा सिनेमा, टेलीविजन या डिजिटल मीडिया से शुरू नहीं हुई। इसकी जड़ें उतनी ही पुरानी हैं जितनी स्वयं भारतीय कला की परंपरा। कविता, मूर्तिकला, लोककथा, लोककला और अनेक प्राचीन कलात्मक विधाओं में भारत सदियों से अपनी कहानियां कहता आया है। तकनीक चाहे जितनी बदल जाए, अनुभवों, भावनाओं और विचारों को कहानी के माध्यम से साझा करने की मनुष्य की मूल प्रवृत्ति नहीं बदलती।

इस विमर्श के केंद्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी रहा। मंत्री ने डिजिटल तकनीक की अपार संभावनाओं को स्वीकार करते हुए यह भी संकेत दिया कि तकनीक को मानवीय कल्पनाशीलता का स्थान नहीं लेने देना चाहिए। ऐसे समय में जब मशीनें टेक्स्ट, तस्वीरें, संगीत और वीडियो तैयार करने में लगातार सक्षम होती जा रही हैं, मौलिक मानवीय रचनात्मकता का महत्व और अधिक बढ़ सकता है। वास्तविक, मौलिक और मानवीय अभिव्यक्ति की मांग भविष्य में और मजबूत हो सकती है।

यह संदेश उन युवा फिल्म निर्देशकों, लेखकों, पत्रकारों, एनिमेटरों, डिजाइनरों और स्वतंत्र कलाकारों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो ऐसे उद्योग में अपना करियर शुरू कर रहे हैं जो इस समय अभूतपूर्व तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।

शेखावत के संबोधन का एक महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया, संस्कृति और पर्यटन के बीच संबंध भी था। एक सफल फिल्म, टेलीविजन सीरीज या स्ट्रीमिंग कार्यक्रम केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहता; वह किसी स्थान की छवि गढ़ सकता है, वहां की संस्कृति और लोगों के प्रति जिज्ञासा पैदा कर सकता है और लोगों को उस स्थान की यात्रा के लिए प्रेरित कर सकता है। इस अर्थ में भारतीय सिनेमा और डिजिटल स्टोरीटेलिंग भारत की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन स्थलों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के प्रभावशाली माध्यम बन सकते हैं।

जब कोई स्थान किसी सफल फिल्म या सीरीज के माध्यम से लोकप्रिय होता है तो वहां पर्यटन बढ़ सकता है, रोजगार पैदा हो सकते हैं और स्थानीय समुदाय के लिए नए आर्थिक अवसर खुल सकते हैं। इसलिए मीडिया और मनोरंजन को केवल एक स्वतंत्र उद्योग के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यापक क्रिएटिव इकोनॉमी के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए जिसमें पर्यटन, संस्कृति, तकनीक, रोजगार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

मंत्री ने भारत की भाषाई विविधता को भी रेखांकित किया। कभी इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वितरण में बाधा माना जाता था, लेकिन आज यही विविधता एक बड़े अवसर में बदल रही है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, सबटाइटल, डबिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अनुवाद ने भाषाई सीमाओं को तेजी से कम किया है। इसका अर्थ यह है कि राजस्थान, बिहार, केरल, बंगाल या पूर्वोत्तर भारत से निकली कोई स्थानीय कहानी आज पूरे देश के साथ-साथ वैश्विक दर्शकों तक पहुंच सकती है।

अंतरराष्ट्रीय बनने के लिए भारत को अपनी स्थानीय संस्कृति को कमजोर करने की आवश्यकता नहीं है। भारत की सफलता का रास्ता अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए उसे सार्वभौमिक बनाने में है।

कार्यक्रम का सबसे यादगार क्षण तब आया जब JioStar के वाइस चेयरमैन और FICCI के पूर्व अध्यक्ष उदय शंकर को FICCI FRAMES Lifetime Achievement Award से सम्मानित किया गया। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। टेलीविजन, स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में उदय शंकर का योगदान भारतीय मीडिया उद्योग के परिवर्तन से गहराई से जुड़ा रहा है।

सम्मान स्वीकार करते हुए उदय शंकर की प्रतिक्रिया केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही। उनका वक्तव्य मीडिया की लगातार बढ़ती शक्ति और जिम्मेदारी पर एक गंभीर चिंतन के रूप में सामने आया। अपने विशिष्ट हास्यबोध के साथ उन्होंने इस बात का उल्लेख भी किया कि ऐसे व्यक्ति को ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ सम्मान मिलने के क्या मायने हैं, जो अभी भी उद्योग में सक्रिय भूमिका निभा रहा हो।

लेकिन उनका व्यापक संदेश कहीं अधिक गंभीर और भविष्य की ओर देखने वाला था। मीडिया समाज की उन महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है जो लोगों की कल्पना, आकांक्षाओं और दुनिया को देखने के नजरिए को प्रभावित करती है। समाचार और मनोरंजन को देखने-सुनने के माध्यम और प्रारूप भले ही बदलते रहें, लेकिन समाज स्वयं को किस तरह समझता और देखता है—इसे प्रभावित करने की मीडिया की शक्ति आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उदय शंकर का ‘Brand India’ बनाने का आह्वान इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। ब्रांड इंडिया केवल कूटनीतिक प्रयासों अथवा समाचार माध्यमों के जरिए नहीं बनाया जा सकता। मनोरंजन, सिनेमा, स्ट्रीमिंग, संगीत और खेल—ये सभी विदेशों में किसी देश की पहचान और छवि को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आज दुनिया के करोड़ों लोगों तक प्रभाव पहुंचाने का माध्यम केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति नहीं रह गया है। संस्कृति और कहानी कहने की क्षमता भी अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। भारतीय मीडिया के सामने यही एक बड़ा अवसर और चुनौती दोनों है।

भारत के पास अपनी कहानियों, सिनेमा, संगीत, नृत्य, खेल और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण अपार संभावनाएं हैं। अगला महत्वपूर्ण कदम इस सांस्कृतिक ऊर्जा को स्थायी वैश्विक प्रभाव में बदलना होगा।

जहां शेखावत ने भारत की सांस्कृतिक शक्ति का व्यापक दृष्टिकोण सामने रखा और उदय शंकर ने वैश्विक महत्वाकांक्षा की बात की, वहीं JioStar के CEO–Entertainment तथा FICCI Media & Entertainment Committee के चेयरमैन केविन वाज़ ने उद्योग की बदलती अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया। आज के मीडिया की चुनौती को शायद एक वाक्य सबसे बेहतर तरीके से व्यक्त करता है—“Attention is the new currency” यानी ध्यान ही नई मुद्रा है।

कई दशकों तक वितरण के साधन सीमित थे। टेलीविजन चैनलों की संख्या कम थी, सिनेमा स्क्रीन सीमित थे और बड़े दर्शक वर्ग तक कंटेंट पहुंचाने के रास्ते भी बहुत कम थे। आज स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है। वितरण के साधनों की भरमार है और कंटेंट की भी। स्मार्टफोन रखने वाला कोई भी उपभोक्ता फिल्म, क्रिकेट, समाचार, शॉर्ट वीडियो, गेम्स, सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग सेवाओं तक तुरंत पहुंच सकता है।

इसलिए आज कंटेंट दुर्लभ नहीं है—दर्शकों का ध्यान दुर्लभ है।

इस नए दौर में केवल अधिक कंटेंट बनाना सफलता की गारंटी नहीं देता। निर्णायक प्रश्न यह है कि कोई कार्यक्रम, फिल्म, खेल आयोजन, समाचार या डिजिटल क्रिएटर उस दर्शक का ध्यान कितनी प्रभावी तरीके से आकर्षित और बनाए रख सकता है, जिसके पास किसी भी क्षण दूसरी स्क्रीन या दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने की पूरी स्वतंत्रता है।

इस परिवर्तन का आर्थिक पैमाना भी प्रभावशाली है। 2025 में भारत का मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग लगभग नौ प्रतिशत बढ़कर ₹2.78 लाख करोड़ तक पहुंचा, जिसमें डिजिटल मीडिया का हिस्सा करीब ₹1 लाख करोड़ रहा। यह उद्योग प्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है। 2028 तक इसके लगभग ₹3.3 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन केवल बड़े आंकड़े भविष्य को परिभाषित नहीं कर सकते। FICCI FRAMES में उठने वाला अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस विशाल पैमाने को दीर्घकालिक आर्थिक मूल्य में कैसे बदला जाए।

केविन वाज़ ने टेलीविजन के बदलते स्वरूप की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। वर्षों से यह भविष्यवाणी की जाती रही है कि टेलीविजन समाप्त हो जाएगा, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। टेलीविजन समाप्त नहीं हो रहा—स्क्रीन बदल रही है।

कनेक्टेड टेलीविजन दर्शकों को पारंपरिक प्रसारण से आगे बढ़ाकर स्ट्रीमिंग, लाइव स्पोर्ट्स, मनोरंजन और ऑन-डिमांड कार्यक्रमों की ओर ले जा रहा है। यह पहले ही कनेक्टेड उपभोक्ताओं का एक विशाल बाजार तैयार कर चुका है।

भविष्य में मनोरंजन और खेल देखने वाले दर्शक उसी स्क्रीन पर विज्ञापन, इंटरएक्टिव सेवाओं, व्यक्तिगत कंटेंट और कॉमर्स से जुड़ सकेंगे। इस तरह कनेक्टेड मीडिया विज्ञापन, इंटरएक्टिविटी, पर्सनलाइजेशन और डिजिटल कॉमर्स के नए अवसर पैदा कर रहा है।

इस परिवर्तन में खेल भी एक महत्वपूर्ण शक्ति बनकर उभरा है। क्रिकेट और अन्य बड़े खेल आयोजन अब केवल एक चैनल पर प्रसारित होने वाली घटनाएं नहीं रह गए हैं। वे लाइव टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरएक्टिव डिजिटल प्लेटफॉर्म को जोड़ने वाले बहुस्तरीय अनुभव बन चुके हैं। इस दृष्टि से खेल भविष्य में लाइव कंटेंट के उपभोग को समझने की सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगशालाओं में से एक बन गया है।

गेमिंग भी भारतीय क्रिएटिव इकोनॉमी का तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र है। भारत के पास युवा आबादी, व्यापक मोबाइल पहुंच और विशाल डिजिटल क्षमता है। गेमिंग को केवल एक अलग व्यावसायिक गतिविधि के रूप में देखने के बजाय भारतीय रचनात्मक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखने की आवश्यकता है। भारतीय पात्रों, पौराणिक कथाओं, इतिहास और मौलिक बौद्धिक संपदा को इंटरएक्टिव अनुभवों में बदलकर वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है।

स्मार्टफोन ने मीडिया निर्माण को उस स्तर तक लोकतांत्रिक बना दिया है जिसकी कुछ वर्ष पहले कल्पना भी मुश्किल थी। स्वतंत्र फिल्म निर्माता, संगीतकार, कॉमेडियन, शिक्षक, ट्रैवल गाइड और स्थानीय कंटेंट क्रिएटर अब उन संसाधनों और बुनियादी ढांचे के बिना भी लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं, जो कभी केवल बड़े मीडिया संस्थानों के पास उपलब्ध थे। यही बदलाव क्रिएटर इकोनॉमी को तेजी से विस्तार दे रहा है।

लेकिन मीडिया के इस लोकतंत्रीकरण ने असाधारण प्रतिस्पर्धा भी पैदा की है। जब हर व्यक्ति संभावित रूप से एक प्रकाशक बन सकता है, तब प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। भविष्य के मीडिया संस्थानों को केवल व्यूज के लिए नहीं, बल्कि विश्वास के लिए भी प्रतिस्पर्धा करनी होगी।

FICCI के अध्यक्ष अनंत गोयनका ने भी इस विचार को आगे बढ़ाया कि भारत की विशाल रचनात्मक क्षमता तभी अधिक आर्थिक महत्व हासिल करेगी जब देश केवल उत्पादन का केंद्र बनने के बजाय अपनी बौद्धिक संपदा—Intellectual Property (IP)—का निर्माण और स्वामित्व करेगा।

एक सफल चरित्र, फिल्म प्रारूप, गेम, फिल्म सीरीज या अन्य बौद्धिक संपदा वर्षों तक अलग-अलग प्लेटफॉर्म, भाषाओं और मर्चेंडाइजिंग के माध्यम से आर्थिक मूल्य पैदा कर सकती है। इसलिए भारत के लिए केवल कंटेंट बनाना पर्याप्त नहीं है—भारत को रचनात्मक संपत्तियां भी बनानी होंगी।

लगभग हर चर्चा किसी न किसी स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी दिखाई दी। AI कंटेंट निर्माण, विजुअल इफेक्ट्स, अनुवाद, रिकमेंडेशन, लोकलाइजेशन, प्रमोशन और वितरण के क्षेत्र में असाधारण संभावनाएं प्रदान करता है। लेकिन इसके साथ कॉपीराइट, सहमति, रोजगार और रचनाकारों के आर्थिक अधिकारों जैसे जटिल सवाल भी जुड़े हैं।

FICCI FRAMES की चर्चाओं से उभरता संदेश यह है कि उद्योग के सामने वास्तविक चुनौती तकनीक और रचनात्मकता में से किसी एक को चुनना नहीं है। चुनौती ऐसा ढांचा तैयार करने की है जिसमें तकनीक रचनात्मकता को और सक्षम बनाए, लेकिन रचनाकार के आर्थिक और नैतिक अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित हो।

आज ग्रैंड हयात के गलियारों में चलते हुए साफ महसूस किया जा सकता था कि भारतीय मीडिया उद्योग एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर उद्योग के दिग्गज डिजिटल उद्यमियों के साथ संवाद कर रहे थे, पारंपरिक ब्रॉडकास्टिंग से जुड़े लोग स्ट्रीमिंग के भविष्य पर चर्चा कर रहे थे, फिल्म निर्माता नई तकनीक पर बात कर रहे थे, स्पोर्ट्स एग्जीक्यूटिव हर स्क्रीन पर फैलते दर्शक वर्ग का विश्लेषण कर रहे थे और नीति-निर्माता ऐसे उद्योग के नियमन पर विचार कर रहे थे जिसमें मीडिया के पुराने विभाजन तेजी से समाप्त हो रहे हैं।

इन सभी चर्चाओं का संदेश किसी एक नेटवर्क, स्टूडियो या कंपनी की वृद्धि से कहीं बड़ा है। भारत के पास विशाल दर्शक वर्ग है, रचनात्मक क्षमता है, कहानियों की कोई कमी नहीं है और तकनीकी सामर्थ्य भी लगातार बढ़ रही है।

यहीं से FICCI FRAMES 2026 की व्यापक दृष्टि आकार लेती दिखाई देती है। शेखावत ने भारत की सांस्कृतिक शक्ति को रेखांकित किया; उदय शंकर ने इसे ‘Brand India’ और वैश्विक प्रभाव से जोड़ा; और उद्योग जगत के अन्य नेताओं ने इस रचनात्मक शक्ति को बौद्धिक संपदा, आर्थिक मूल्य और स्थायी व्यावसायिक मॉडल में बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारतीय मीडिया का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि वह कितना कंटेंट तैयार करता है। असली प्रश्न यह होगा कि वह कैसा कंटेंट बनाता है—क्या वह प्रामाणिक है, क्या उसकी अपनी विशिष्ट पहचान है, क्या उसमें व्यावसायिक मूल्य है और क्या उसमें ऐसी स्पष्ट भारतीय आत्मा है जिसे दुनिया समझ सके और स्वीकार कर सके।

आज मुंबई के ग्रैंड हयात से FICCI FRAMES 2026 की सबसे महत्वपूर्ण आवाज शायद यही सुनाई दे रही है—भारत मीडिया की दुनिया में विशाल पैमाना हासिल कर चुका है। अब अगला लक्ष्य इस पैमाने को रचनात्मक शक्ति, आर्थिक मूल्य और वैश्विक प्रभाव में बदलना है।

चाहें तो मैं इसी हिंदी संस्करण को और अधिक प्रभावशाली, वरिष्ठ संपादकीय शैली में लगभग 1500–1800 शब्दों का फ्रंट-पेज/विशेष रिपोर्ट संस्करण भी तैयार कर सकता हूँ।

डॉ. अनिल सिंह
संपादक, Top Story एवं STAR Views — अमेरिका स्थित डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क
ग्रैंड हयात, मुंबई से लाइव | 29 सितंबर 2026

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