Noida Property Case: शिक्षा और भरण-पोषण के लिए नाबालिग बेटे की संपत्ति बेचने की मां को अनुमति

Noida Property Case: शिक्षा और भरण-पोषण के लिए नाबालिग बेटे की संपत्ति बेचने की मां को अनुमति

नोएडा। अदालत ने नाबालिग बेटे के हिस्से की संपत्ति बेचने की अनुमति उसकी मां को कुछ शर्तों के साथ दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की संपत्ति से जुड़े किसी भी मामले में यह देखना जरूरी है कि प्रस्तावित बिक्री वास्तव में उसकी जरूरत को पूरा करती है और उससे उसे स्पष्ट लाभ होने वाला है या नहीं। इसी आधार पर अदालत ने मां को ग्रेटर नोएडा के ओमीक्रॉन-3 सेक्टर स्थित फ्लैट में नाबालिग बेटे के हिस्से की बिक्री की अनुमति प्रदान की।

कुरुक्षेत्र, हरियाणा निवासी श्वेता दुरेजा ने अपने करीब 15 वर्षीय बेटे की प्राकृतिक संरक्षिका के रूप में अदालत में विविध वाद दायर किया था। याचिका में उन्होंने ग्रेटर नोएडा के ओमीक्रॉन-3 सेक्टर में स्थित एक फ्लैट में अपने नाबालिग बेटे के एक-तिहाई हिस्से को बेचने की अनुमति मांगी थी।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार उक्त आवास श्वेता दुरेजा के पति अंकुर दुरेजा को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की ओर से आवंटित किया गया था। अंकुर दुरेजा का 25 फरवरी 2020 को निधन हो गया था। पति की मृत्यु के बाद संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित प्रक्रिया पूरी की गई और 27 जून 2024 को संपत्ति श्वेता दुरेजा, उनके बड़े बेटे शौर्य और नाबालिग बेटे के नाम हस्तांतरित हुई।

श्वेता ने अदालत को बताया कि वह गृहिणी हैं और उनके पास आय का कोई अन्य नियमित साधन नहीं है। उन्होंने कहा कि नाबालिग बेटे की शिक्षा, भरण-पोषण, इलाज और भविष्य में विवाह से संबंधित खर्चों के लिए धन की आवश्यकता है। इसी जरूरत को देखते हुए उन्होंने बेटे के हिस्से की संपत्ति को बेचने की अनुमति मांगी थी।

मामले की सुनवाई के दौरान जिला शासकीय अधिवक्ता दीवानी की ओर से इस आवेदन पर आपत्ति भी दर्ज की गई। आपत्ति में कहा गया कि नाबालिग के कुछ निकट संबंधियों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है। इसके साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि संपत्ति बेचने के लिए पर्याप्त और उचित कारण स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखा गया है।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि नाबालिग की संपत्ति बेचने की अनुमति देने में उसकी वास्तविक जरूरत और उसके हित में होने वाला स्पष्ट लाभ सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और मामले में रखे गए तथ्यों का परीक्षण करने के बाद माना कि नाबालिग को उसके पिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के तहत संपत्ति में हिस्सा प्राप्त हुआ है।

अदालत ने यह भी माना कि श्वेता दुरेजा अपने नाबालिग बेटे की प्राकृतिक संरक्षिका के रूप में अनुमति मांगने की स्थिति में हैं। अदालत के अनुसार प्रस्तुत परिस्थितियों से यह सामने आता है कि बेटे की शिक्षा, भरण-पोषण और अन्य आवश्यकताओं के लिए धन की जरूरत है और प्रस्तावित बिक्री से नाबालिग को वास्तविक लाभ हो सकता है।

इसी आधार पर अदालत ने श्वेता दुरेजा को नाबालिग बेटे के हिस्से की संपत्ति बेचने की अनुमति दे दी। हालांकि अदालत ने इस अनुमति के साथ वित्तीय सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण शर्त भी लगाई है, ताकि बिक्री से प्राप्त रकम का उपयोग नाबालिग के हितों के अनुरूप हो और उसकी संपत्ति की राशि पूरी तरह सुरक्षित रहे।

अदालत ने निर्देश दिया कि संपत्ति की बिक्री से प्राप्त रकम का 50 प्रतिशत हिस्सा नाबालिग के बालिग होने तक या अदालत के किसी अन्य आदेश तक किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा यानी एफडी के रूप में रखा जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य नाबालिग के भविष्य के लिए उसकी हिस्से की राशि को सुरक्षित रखना है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संपत्ति बेचने की अनुमति केवल उसी उद्देश्य और उसी सीमा तक दी गई है, जिसका उल्लेख अदालत के समक्ष प्रस्तुत प्रार्थना पत्र में किया गया था। इसका अर्थ यह नहीं होगा कि अदालत ने संपत्ति पर पक्षकारों के स्वामित्व या अधिकारों का अंतिम निर्धारण कर दिया है।

मामले में अदालत की शर्तों के बाद अब संपत्ति की बिक्री निर्धारित प्रक्रिया के तहत की जा सकेगी। साथ ही नाबालिग के हिस्से से प्राप्त राशि का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित निवेश में रखने के कारण उसके भविष्य के हितों को भी संरक्षित किया गया है।

यह आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि नाबालिग की संपत्ति से जुड़े मामलों में केवल संरक्षक की आवश्यकता बताना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि अदालत यह भी देखती है कि संपत्ति बेचने का निर्णय नाबालिग के हित में है या नहीं। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आवश्यकता और नाबालिग के लाभ को ध्यान में रखते हुए सशर्त अनुमति प्रदान की है।

 

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